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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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हंबीरगढ़ एक 1686 का जुलाई महीना चल रहा था। बादशाह का डेरा रसूलपुर में खड़ा किया गया था। वहाँ से बीजापुर की दूरी इतनी ही थी कि दूर तक मार करने वाली तोप वार कर सकें। देखते-देखते दिन बीतते गये। बादशाह को बीजापुर आये साठ दिन बीत चुके थे। फिर भी सामने की दीवार गिर नहीं रही थी। बादशाह अपने डेरे के पास खड़े होकर सन्तप्त दृष्टि से बीजापुर की ओर देखता था। तब उसे अनुभव होता था कि गन्धक और तोप के धुएँ में डूबे शहर की ऊँची मीनार उसकी ओर टकटकी लगाए देख रही है। गोल गुम्बद की भव्य इमारत बादशाह के कलेजे में काँटे की तरह चुभती थी। शहर के चारों ओर दो सशक्त तटबन्दियाँ ही बीजापुर की शक्ति थी। किन्तु गोलकुंडा और शम्भू महाराज का पन्हाला, बीजापुर की प्रच्छन्न रक्तवाहिनियाँ थीं। यद्यपि कुतुबशाह ने समझौता कर लिया था कि बादशाह को उस पर विश्वास नहीं था। इसलिए उसने कुतुबशाह को एक चेतावनी भरा पत्र लिखा था, "यदि तुम्हें अपने तख्त को बचाने की चिन्ता है तो बीजापुर के किसी मामले मे दखलन्दाजी करने का व्यर्थ प्रयास नहीं करना।" उसी समय मुगलों की रसद लूटने वाले हंबीरराव मोहिते का मुकाबला करने के लिए बादशाह ने एक विशेष फौज तैयार की थी। वजीर का अनुमान सही निकला। बड़े शहजादे मुअज्जम का बीजापुर आना छोटे शहजादे आजम को अच्छा नहीं लगा। पहले ही दिन "अब यह आया है मंडी लूटने के लिए।" इस आशय से उसने अपने बडे भाई की ओर घूर कर देखा। बड़ा भाई मुअज्जम भी छोटे भाई से उतना ही द्वेष करता था। यदि बीजापुर वाले आत्मसमर्पण करते तो उसका श्रेय आजम को मिलने वाला था। मुअज्जम के लिए यह सम्भव नहीं था। समय के साथ मुअज्जम ने भी अपनी अकल दौड़ानी सम्भाजी 547