छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 565, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंइतना लम्बा सफर हंबीरराव की सेना ने दस-बारह घंटों में तय कर लिया। दूसरे दिन सवेरे ही पूरी सेना महाबलेश्वर पहुँच गयी। शत्रु अभी वहाँ नहीं पहुँचा था, इसकी पक्की जानकारी मिली। सेना वापस मुड़कर घौड रास्ते से सीधे गुरेघर की चढ़ाई पार कर पाँचगणी पहुँच गयी। वहाँ पर सेना ने दोपहर का कुछ विश्राम किया। पाँचगणी से निकलते-निकलते अँधेरा घिर आया था। इस जंगली प्रदेश का चप्पा-चप्पा नारोजी भोसले को पता था। सर्जाखान की आधी फौज पाँचगणी का घाट पार कर ऊपर आ गयी थी। उसने रात बिताने के लिए घाट की एक खोह का आश्रय लिया। पाँचगणी की भोर की गुलाबी ठंडक में सर्जाखान सोया हुआ था। उसी समय 'हर हर महादेव' का शोर उठा। हंबीरराव के घोड़े सर्जाखान पर टूट पड़े। वह छोटी-सी घाटी घोड़ों और मनुष्यों से भर गयी। मार काट शुरू हुई। सोते समय ही मराठों ने खान पर आक्रमण किया था। अचानक ऊपर के पहाड़ से दैत्यों की तरह दौड़ते हुए आये थे। मुगल फौज की दुर्दशा हो रही थी। घाट के रास्ते से उनसे भागते भी नहीं बन रहा था। मराठों ने मुगलों के दो हजार सैनिकों को मार गिराया। इस भयंकर आक्रमण से मुगल सेना जान बचाकर भागने लगी। मुगल वाई की ओर भागने लगे। सूर्य के निकलने के पहले ही हंबीरराव ने घाटी और घाट के रास्ते पर अपना कब्जा जमा लिया था। प्रतापगढ़ की ओर बढ़ने के खान के स्वप्न को चूर चूर कर दिया था। दहशत खाई बीजापुरी और मुगल फौज नदी पार कर केंजल जंगल मे भाग गयी थी। सर्जाखान की फौज तीन गुना थी। कुछ लोग हड़बड़ा गये थे किन्तु आज हंबीरराव के शरीर में प्रचंड वीरत्व उत्पन्न हो गया था। अपने घोड़े को शिविर में नचाते हुए उन्होंने कहा, "चलो हमारा एक-एक वीर और एक-एक घोड़ा दस दस के लिए भारी है। बोलो हमला—" दुश्मन थोड़ा पीछे हट गया था। किन्तु साहसी हंबीरराव ने कहा, "लगे हाथ इन्हें आज ही समाप्त कर दो। कृष्णा नदी के किनारे सर्जाखान नाम की जहरीली लता को आज ही जड़ से उखाड़ कर फेंक दो। अन्य लोगों ने पूछा, "आज के दिन थोड़ा विश्राम किया जाये तो ?" हंबीरराव का शरीर कुछ ढीला पड़ गया था। वहीं पर दरी पर एक चद्दर डालकर मामा लेट गये। थोडी ही देर में वे गहरी नींद में सो गये। वर्षों के कष्ट, परिश्रम, चारों मौसमों की भाग दौड़ से मामा का शरीर दुख रहा था। किसी प्रकार आधा घंटा हुआ होगा कि उन्हें लगा जैसे कान में कोई कीड़ा घुस गया। वे झट से उठकर बैठ गये। उन्होंने अपने सहयोगियों को जोर से पुकारा, "चलो बच्चो उठो, हमारा शम्भूराजा हमारी राह देख रहा है। अभी ऐसी बहुत सी लड़ाइयाँ जीतनी हैं, सम्भाजी 563