भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 567

एक आँख फूट जाने से गाल पर रक्त की धारा बह रही थी। वहाँ खून जम गया था। उसने पलकों को झपकाते हुए एक आँख खोली। थोड़ी ही दूरी पर घोड़े पर सवार हंबीरराव को देखा। बदले की भावना से उसका खून खौल उठा। पास ही तोप पड़ी हुई थी। उसने बड़ी कठिनाई से सामने पड़ी तोप में बत्ती लगाई। धूम-धड़ाम की तेज आवाज के साथ गोला निकला। धूल का बवंडर उठा। क्या इसका पता लगने से पहले गोला हंबीरराव की ओर आया। धुएँ को देखकर सभी का कलेजा मुँह को आ गया। 'माँमाँऽ' 'हंबीरमामाऽऽ' चिल्लाते हुए लोग उसी ओर दौड़ पड़े। सामने हंबीरमामा का आधा जला शरीर घोड़े के साथ गिरा पड़ा था। मस्तक के स्थान पर सिर्फ जला हुआ मांस ही दिखाई पड़ रहा था। रायगढ़ की सीढ़ियों का एक बलिष्ठ शिलाखंड केंजल की भूमि पर टूटकर चूर-चूर हो गया था। मनुष्य, पशु, पक्षी यहाँ तक कि सारा आकाश अवाक् हो गया। सारे दिन दूर से युद्ध को देखते रहने वाले चन्दन वन्दन किले का चेहरा भी स्याह हो गया। पास ही बह रही कृष्णा माई का प्रवाह ठहरा हुआ सा लग रहा था। मांढरदेवी पहाड़ी की देवी कालूबाई फूट फूटकर रो रही थी। एक महान संकल्प का दुखद अन्त हो गया था। हंबीरमामा का क्षत विक्षत शरीर उठाकर पालकी में रखा गया। उनके वीर घोड़े की भी ग्रामीणों ने आदरपूर्वक समाधि बनायी। घोड़े की जीन का सामान भी वहीं पड़ा था। मर्जाखान की सेना से लूटे गये हीरे जवाहरात भी वहीं पड़े थे। हबीरराव के रक्त मे काली मिट्टी सोना बन गयी थी। हीरे मोती की कीमत माटी के बराबर हो गयी थी। हंबीरराव के वीरगति प्राप्त करने का समाचार रायगढ़ पर पहुँचा। सभी जगह हाहाकार मच गया। शम्भू महाराज नीचे रायगढ़वाड़ी में गये थे। वहाँ पर अठारह कारखानों का निरीक्षण चल रहा था। वहीं पर उन्हें यह भयानक समाचार मिला। यह समाचार सुनकर शम्भू महाराज दो घंटे तक एक ही स्थान पर विक्षिप्त की भाँति बैठे रहे। फिर रायगढ़ की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। अन्य समय शम्भू महाराज घोड़े को नचाते हुए एक ही बार में किले पर चढ़ जाते थे। यदि पैदल हुए तो तेज गति से बिना कहीं रुके किले पर चढ़ते थे। अपने साथ चलने वालों साथियों और सेवकों को पसीने से तरबतर कर देते थे। किन्तु आज वे नंगे पाँव किला चढ़ रहे थे। रास्ते में बार बार बैठ जाते थे। सेवकों ने पालकी में बैठने का बार बार आग्रह किया किन्तु वे नहीं माने। महाराज किसी प्रकार किले के ऊपर आ गये। उन्होंने केवल खंडो बल्लाल से कहा, "हंबीरमामा के यथोचित अन्तिम संस्कार के लिए जितना भी आवश्यक हो, सरकारी खजाने से दे दीजिए। कराड के सूबेदार को इसकी सूचना यथाशीघ्र भेज दीजिए।" शम्भू महाराज अपने महल में न जाकर उसी स्थिति में जगदीश्वर के सम्भाजी 565

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास) · पृष्ठ 567, कुल 793 में से · BharatKosha