छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें'तामनाले' गाँव में।" इस समाचार से महाराज के होश उड़ गये। वे घायल शेर की तरह वहीं पर चक्कर काटने लगे। वे अत्यन्त बेचैन थे। वे अत्यधिक क्रोध से बोले, "नहीं, नहीं येसू ! प्रलय आ जाये तो भी ऐसी बात नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आठ वर्षों तक हमने जो युद्ध किया, रात-दिन एक कर दिया, जिस उद्देश्य से हमारे हजारों वीर और जानवर मिट्टी में मिल गये, उन सभी के वीरत्व और बलिदान पर पानी फिर जाएगा।" "सच है, महाराज !" "सह्याद्रि के घाट को पार करके मुगलों को अन्दर आने देना मृत्यु को निमन्त्रण देना है। उन्हें बुलाते हुए अपनी गुफा में ले आना किसी प्रकार अच्छा नहीं। यह सम्भव नहीं है। मुगलों की फौज की तो बात ही क्या? उनके भूले भटके दो चार घोड़ों का सह्याद्रि के इस क्षेत्र में पहुँचना उचित नहीं है।" कविराज का महल महाराज के महल के इतना समीप था कि बुलाने पर भी सुना जा सके। उन्हें तत्काल सूचित किया गया। वे तुरन्त तैयार होकर महाराज के सम्मुख उपस्थित हुए। प्रतिदिन की समस्याओं और संकटपूर्ण स्थितियों ने, शम्भू महाराज, कविराज और महारानी को इतना समीप ला दिया था कि अनेक बार उनकी झपकने वाली पलकें, रुकी हुई साँसें और व्यंजक दृष्टियाँ ही पूरा संवाद कर लेती थीं। अनेक बार प्रत्यक्ष संवाद की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। महाराज ने पूछा, "कविराज, अपने कलेजे में तेज कटार भोंककर क्या किसी का जिन्दा रहना सम्भव है? उसी तरह कल यदि सह्याद्रि को पारकर कोंकण में मुगलों की चौकी बन गयी तो ?—तो इस हिन्दवी स्वराज्य का टिक पाना सम्भव है क्या ?" "कौन, कौन दुस्साहसी निकला है ऐसी चौकी बनाने ?" कविराज ने प्रतिप्रश्न किया। शम्भू महाराज ने वह गुप्त पत्र कविराज को दिया। उस पर नजर घुमाते ही कविराज चिन्तित हो गये। महाराज ने उसी क्षण प्रश्न किया, "कविराज अपना मलकापुर के पास का तबेला कैसा है ?" "महाराज, एकदम चिन्ता न करें। मलकापुर के पास की व्यवस्था पक्की है। वहाँ पर पेरीड और कड़वा के मैदान में दस हजार तगड़े घोड़ों को मैंने तैयार रखा है।" इस चर्चा से महाराज को सान्त्वना मिली। कविराज को भी अच्छा लगा। किन्तु येसूबाई ने चिन्तित स्वर में कहा, "केवल मलकापुर के रास्ते पर ही सारी 580 :: सम्भाजी