छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 705, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसामने की ओर से फौजी पंक्तियों का जुलूस जाने वाला था। समुद्र के उमड़ते प्रवाह की तरह जुलूस निकलने वाला था जिसमें गाँव के लोग, सैनिक और देखने वालों की भीड़ के बीच से सैनिक आगे निकलने वाले थे। उनकी सुरक्षा का दायित्व बहादुरगढ़ के थानेदार महादजी निंबालकर को सौंपा गया था। विशेष रूप से शिवाजी के जामाता और सम्भाजी के बहनोई यह दायित्व बड़ी ईमानदारी से निभा रहे थे। वे व्यवस्था की निगरानी करते इधर-उधर घूम रहे थे किन्तु सम्भाजी से आँखें मिलाना टाल रहे थे। खुले ऊँट पर बिठाए गये सम्भाजी को रस्सियों और जंजीरों से कसकर बाँधा गया था। बाँधने का यह काम एक राजपूत सरदार अमरसिंह स्वयं कर रहा था। सम्भाजी राजा ने बहुत दिनों से बन्दी होने के कारण बाहर का प्रकाश ही नहीं देखा था। पिछले कुछ दिनों से न उनके हाथ खुले थे और न ही वे ठीक से साँस ले पा रहे थे। किसी से बात करने का तो प्रश्न ही नहीं था। परिस्थिति ने ही उन्हें मौन बना दिया था। अपने शरीर के चारों ओर रस्सी बाँधने वाले, लम्बी सुघड़ दाढ़ी वाले अमरसिंह को सम्भाजी राजा ने देखा। उन्होंने अमरसिंह का हाथ पकड़ा और भावविभोर होकर बोले, “तुम जाति से राजपूत लग रहे हो हमारे दुर्गादास के प्रदेश के?'' “जी हाँ" उसने हुंकारी भरी। “मित्र! तुम्हें तुम्हारे ईश्वर का वास्ता देकर कहता हूँ। बहुत हो गया यह अपमान, हमें इस बेइज्जती से, इस यातना से मुक्त कर दो।'' “लेकिन शाही हुक्म महाराज!" “बन्धु ! एक हिन्दू के नाते तुम्हें खून की सौगन्ध है। शिवाजी के बेटे को इस तरह कुत्ते की मौत मरते देखना क्या तुम्हें शोभा देगा? चलो दोस्त बस एक उपकार कर दो।" सम्भाजी ने बड़ी हताशा से कहा। “क्या करूँ महाराज ?" “झट से उठाओ अपनी तलवार और कर दो हमारे टुकड़े-टुकड़े। रुको मत बन्धु ।" अमरसिंह भावविभोर हो गया। उसने सम्भाजी राजा की आँखों में उमड़ते आँसुओं को देखा, तत्काल उसका हाथ म्यान पर पड़ा। वह तलवार निकालने ही वाला था कि किसी दूसरे के मजबूत हाथों का पंजा पड़ा। परिणामस्वरूप यह प्रयास वहीं रुक गया। बगल में क्रूर चेहरे वाला इखलासखान खड़ा था। उसने पूछा, “क्यों सरदारजी क्या इरादा है?" सचमुच अमरसिंह को सम्भाजी पर बड़ी दया आ गयी थी। किन्तु मुक्ति का यह अवसर वहीं पर समाप्त हो गया। विडम्बना और अपमान की कोई सीमा न रही। जिस राजा के शरीर पर महँगे सम्भाजी :: 703