छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 707, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंचलने लगा। एक मोड़ पर उसने सम्भाजी राजा की ओर देखा। राजा की अत्यन्त तेजस्वी, बड़ी-बड़ी आँखें उसने देखीं, आँख से आँख मिली। राजा अत्यन्त उदासी से हँसे। उन्होंने सोचा, 'होगा कोई अपने रायप्पा जैसा दिखाई देनेवाला भिश्ती।' सरस्वती नदी के किनारे खंडोवा का मैदान इससे पहले कभी भी इतना भयभीत नहीं हुआ था। बहादुरगढ़ के आसपास रहने वाले बड़े विश्वास से कहते थे कि इस मैदान में अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भूतों का जुलूस निकलता है। इस जुलूस के आगे-आगे बैताल अपनी जटाएँ हवा में लहराते हुए भयानक नृत्य करते हैं। किन्तु आज का यह कबन्धों का नंगा नाच अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण था। आज का दुर्भाग्यपूर्ण जुलूस ढोल-तासे बजाता आगे निकल रहा था। शिवाजी महाराज की मृत्यु के केवल नौ वर्षों बाद उनके राजहंसी बेटे का खुलेआम अपमानजनक जुलूस निकाला जा रहा था। वह भयानक दृश्य, वे मरियल ऊँट, विदूषकों का वह पहनावा और मराठों की इज्जत की धज्जियाँ उड़ते देखकर बहादुरगढ़ की मिट्टी तक काँप उठी थी। श्मशान और मैदान के भूत पिशाच शर्मिन्दा होकर बाहर निकल गये थे। अपने आपको तैमूर का वंशज कहने वाले, दिल्ली की राजगद्दी की पाँच सौ वर्षों की परम्परा का उत्तराधिकारी मानने वाले इस निरंकुश और बेवकूफ बादशाह पर सभी जड़-चेतन हँस रहे थे। जुलूस आगे निकला। नासमझ बच्चे और स्त्रियाँ सम्भाजी राजा पर थूक रहे थे। इस प्रकार का अभद्र व्यवहार कर रहे थे। अपने राजा की यह अपमानजनक स्थिति देखकर निष्ठावान रायप्पा का कलेजा टुकड़े टुकड़े हो रहा था। जंजीर की कड़ियाँ और रस्सियाँ राजा के शरीर में चुभ रही थीं। पहले तो राजा के शरीर मे असह्य पीड़ा उठी परन्तु धीरे-धीरे उनका शरीर संवेदनशून्य हो गया। मानो वह सूखा काठ हो गया हो। उस दुर्देवी जीव को अब किसी का भय, कोई शर्म शेष ही नहीं रहा। अब न किसी के प्रति क्रोध था, न ही अस्वीकार। बड़ी बड़ी गम्भीर आँखें सीधे सामने की ओर देख रही थीं। कहाँ गयीं वे पालकियों ? राज्यारोहण के समय रायगढ़ पर निकली वह शोभा यात्रा ? कहाँ गये वे हाथ जिन्होंने राजा को देवता की तरह पालकी में बिठाकर घुमाया था, राजा को स्वराज्य भर में गौरव दिया था। कहाँ वह माणिक मोतियों से सजा राजमुकुट ? और कहाँ यह घुँघरूओ वाली विदूषक की लकड़ी की टोपी ? कहाँ गले में चमकने वाले हीरे जवाहरात के गहने ? और कहाँ यह शरीर मे चुभने वाली, जगखाई जंजीरों का अशोभनीय बोझ ? माघ मास का तपता सूर्य सिर पर अंगारे बरसा रहा था। जिस सिर पर देवो की भाँति पुष्प वृष्टि होती थी, उसी सिर पर आज फटे जूतों और पत्थरों से प्रहार हो रहा था। यह कैसा जुलूस ? यह तो देवदूतों का सिर फोड़ने वाली शोकयात्रा थी। वे बड़ी बड़ी आँखें झपक नहीं रही थीं। उन्हीं खुली आँखों से हांकर अतीत सम्भाजी 705