छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशम्भू बेटे, उस राक्षस के कारण न चाहकर भी तुम्हारे साथ आगरे तक जाना पड़ा था। पुरन्दर की वह घटना हमारे जीवन का अपमानपर्व था। बेटे, इस प्रकार का घातक, कपटी और निरंकुश शत्रु जब विशाल सेना समुद्र लेकर महाराष्ट्र तक आया तो कोई अन्य व्यक्ति उस सागर की तरंगों को देखकर ही जान बचाकर भाग गया होता। किन्तु बिना तनिक भी घबराए, अपनी पीठ पर सह्याद्रि की श्रेणियों को बाँधे उस दुष्ट से बड़ी कठोरता से दीर्घकाल तक लड़ते रहे। "जब बहुतों की तलवारों को जंग लग रही थी, बुद्धिमानों की प्रज्ञा समाप्त हो चुकी थी, मर्दों के पैर पंगु हो गये थे, सामान्य जनता भुखमरी से जूझ रही थी, तब बचे खुचे लोगों को एकत्र करके, मुसीबतों से टकराते हुए तुमने संकट की कन्दराओं से अपना मार्ग निकाला। इतनी बड़ी फौज के साथ, इतने कम साधनों में, इतने लम्बे समय तक मुकाबला करने वाला, जवाँ मर्द खोज करने के लिए इतिहास के पृष्ठों में गहन शोध करनी पड़ेगी। सच कहूँ शम्भूऽऽ, मुझे तो लगता है कि तुम्हारे भावी पराक्रम को ध्यान में रखकर ही तुकोबा माउली ने ये पंक्तियाँ रची थीं— पुत्र हो तो ऐसा मुस्तंडा, जिसका तीनो लोक मे झंडा। "बस, बस, पिताजी, मृत्यु महामन्दिर की ओर प्रयाण के पूर्व आप मिल गये यह मेरा सौभाग्य है। आपके इन शब्दों ने मुझे इतना तृप्त कर दिया है कि अब शरीर पर सहस्रों मरणों की वर्षा भी मुझे दुखी नहीं कर सकती।" "शम्भू बेटे, आज इस शिवाजी का कलेजा तिल तिल करके टूट रहा है तो केवल दो बातों के लिए। अपने स्वजनों ने घात करके तुम्हारे पराक्रमी पैर तोड़ दिये। दूसरे नियति क्रूर चक्र को देखकर भी आत्मा आहत होती है—" "पिताजीऽऽ!" "हाँ, शम्भू बेटे, क्या मेरी जिन्दगी में ऐसी कठिन परीक्षा के क्षण कम आये हैं? कुटिल अफजलखान से मिलने हम पालकी में जा रहे थे। कहारों के पदक्षेप के साथ मृत्यु मेरे साथ चल रही थी। वहाँ से मैं केवल भाग्यवश ही बच सका। आगरे के कैदखाने के सामने हजारों यवनों का घेरा क्या कम भयानक था? तुम्हारे साथ ही वहाँ से भी सकुशल छूट गये। जालनापुर जीतकर लौटते हुए संगमनेर के पास जंगलों में रणमस्तखान की धोखादायक कुटिल रणनीति से तो बाल बाल बचा था। थोड़ा ही अन्तर पड़ा था, नहीं तो जो दुर्दैव तुम पर संगमेश्वर में आया, वह मुझ पर संगमनेर में आ गया होता।" शिवाजी महाराज रुके, उन्हें जोर का झटका लगा। शम्भूराजा की ओर सम्भाजी 757