भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ। दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥ 342 ॥ परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग। काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥ 343 ॥ परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ। मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 344 ॥ परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार। दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥ 345 ॥ अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ। काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥ 346 ॥ सजीवन दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ। जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥ 347 ॥ मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास। पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 348 ॥ तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल। दादू माखण ह्रै गया, काहू का स्थूल ॥ 349 ॥ दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि। मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥ 350 ॥ दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक। राम दूध सब भरि रह्या, ऐसा अमृत पोष ॥ 351 ॥ दादू झूठा जीव है, गढ़िया गोविन्द बैन। मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥ 352 ॥ सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार। दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ 353 ॥

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