भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 504 में से

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पृष्ठ 139

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 प्राणी तन मन मिल रह्या, इंद्री सकल विकार । दादू ब्रह्मा शूद्र धर, कहाँ रहै आचार ॥ 96 ॥ मन की चपलता दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ । दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 97 ॥ दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत । मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 98 ॥ निश्चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि । दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥ 99 ॥ दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ । दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 100 ॥ मांही सूक्ष्म है रहै, बाहरि पसारै अंग । पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥ 101 ॥ आशय विश्राम सपना तब लग देखिये, जब लग चंचल होइ । जब निश्चल लागा नाम सौं, तब सपना नांही कोइ ॥ 102 ॥ जागत जहाँ जहाँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ । दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥ 103 ॥ दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति । बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 104 ॥ सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ । दादू केते जुग गये, तो भी हऱ्या न जाइ ॥ 105 ॥ जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम । भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 106 ॥ जहाँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ । दादू वासा प्राण का, जहाँ पहली रह्या समाइ ॥ 107 ॥

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