सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन घने खेजड़ा ( राजस्थानी शमी वृक्ष ) के नीचे रुक गया और उन्हें बैठने का संकेत कर लुप्त होगया । श्री दादूदयालजी महाराज तत्काल इस घटना का आशय समझ गए और पद्मासन लगाकर आत्मचिंतन में लीन होगए । ऐसी आत्म - लीनावस्था में श्री महाराजजी के अंगों से दिव्य तेज विकीर्ण होकर समस्त क्षेत्र को आलोकित करने लगा । दैव प्रेरित होकर राजा नारायणदासजी भी प्रजा वर्ग के साथ उसी स्थान पर आ पहुँचे । सबने महाराज श्री के अंगों से निकलता दिव्य तेज देखा और यह भी देखा कि महाराजजी के आस - पास नाना प्रकार के प्राणी घूम रहे हैं जिनमें कुछ के मुख मनुष्य जैसे तथा शरीर का शेष भाग विभिन्न पशुओं जैसा तथा कुछ के मुख पशुओं जैसे तथा शरीर का शेष भाग मनुष्य जैसा था । ऐसा अनोखा दृश्य देख सभी लोग आश्चर्यचकित होगए और कुछ लोग भयभीत भी हुए । तीसरे दिन सारे विचित्र प्राणी लुप्त होगए तथा स्थिति सामान्य होगई । उसी समय श्री दादूदयालजी महाराज के नेत्र खुले और उन्होंने वरदमुद्रा में "सत्यराम" आशीर्वाद दिया । वाणीजी की रचना - वाणीजी का रचना काल आजसे लगभग 450 वर्ष पूर्व का है । महाप्रभु दादूदयालजी महाराज ने रचना की दृष्टि से कोई स्वतन्त्र काव्य नहीं रचा है; प्रत्युत समय समय पर शरणागत मुमुक्षुजनों को महाराज पद्यमय वाणी में आत्मोपदेश करते, उन्हीं को उनके शिष्यादि ने संग्रहित कर लिए । मोहनदासजी(दफ्तरी), जगन्नाथजी, संतदासजी दादूजी महाराज के अनन्य शिष्य भक्त थे; जो सदा उनकी शरण में रहते थे । शरणागत मुमुक्षुओं को महाप्रभु जो आत्मोपदेश करते, उनको अक्षरशः ये तीनों महात्मा संग्रहित कर लेते थे । उन पद्यों के 'लिपि-संग्रह' का कार्य शिष्य मोहनजी दफ्तरी करते थे, मोहनजी की 'दफ्तरी' संज्ञा इसी कारण पडी थी । दादूजी महाराज अपनी साधना में प्रार्थना का स्थान भी रखते थे । समस्त 'वाणी' संग्रह को
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