सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
समय की बोलचाल की भाषा में की गई है । स्थल विशेषों में अरबी, फ़ारसी, गुजराती, मराठी, सिंधी व् पंजाबी भाषा का प्रयोग हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि दादूजी महाराज कई भाषाओं पर अधिकार रखते थे । ‘वाणीजी’ में सभी तरह के शास्त्रीय, वेदांत, योग, सांख्य, उपनिषद व गीता के सिद्धांतों का प्रकरण-विशेष में अच्छा समन्वय है । इससे प्रतीत होता है कि - जिज्ञासुओं ने महाराज से सभी विषयों पर प्रश्न किये थे, उनका उत्तर आपने बड़ी सुगम व प्रांजल भाषा में दिया है । दादूवाणी में माधुर्य की तो अजस्र धारा ही बह चली है । अन्त समय में उनके पट्टशिष्य गरीबदासजी ने प्रश्न किया - “स्वामिन् ! आपने ऐसा मार्ग दिखाया है जो हिन्दू मुसलमानों की सीमित सीमा से आगे का है । किन्तु इसका आगे कैसे निर्वाह होगा ?” महाराज ने कहा - “तुम ऐसा विचार मत करो, जो अपने धर्म में रहेंगे उनकी रक्षा राम करेंगे, और तुम विशेष चाहो तो हमारा शरीर रखलो, जो भी पूछना चाहोगे उसी का उत्तर इससे मिलता रहेगा, तथा ऐसा भी न समझो कि वह शरीर खराब हो जायगा, यह पंच तत्व से बना हुआ नहीं है, यह तो दर्पण में प्रतिबिंबित शरीर के समान है । यदि तुम्हें संशय हो तो हाथ फेर कर देखलो ।” गरीबदासजी ने हाथ फेरा तो शरीर दीपक ज्योति सा प्रतीत हुआ, दीखता तो था किन्तु पकड़ने में नहीं आता था । फिर गरीबदासजी ने कहा - “जब आपने ऐसा देह बना लिया तो कुछ दिन इसे और रखने से तो हम शवपूजक कहलाएंगे जो आपके उपदेश के अनुसार उचित नहीं ।” महाराज बोले - “तो फिर यहां एक बिना तेल - घृत और बत्ती के अखंड ज्योति रहेगी उससे तुम्हारे सभी कार्य सिद्ध होते रहेंगे ।” गरीबदासजी ने कहा - “उस ज्योति के महान् चमत्कार को देखकर यहां जनता का आना जाना अधिक रहेगा जो हमारे साधन में पूर्ण विघ्न बनेगा, हम पंडे बन जाएंगे, अतः यह भी ठीक नहीं है ।” गरीबदासजी की निष्कामता देखकर महाराज प्रसन्न हुए
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