भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी ।। महिमा - महात्म्य ।। ।। दोहा ।। प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय । कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय ॥ 1 ॥ ।। कवित्त ।। अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी । साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ॥ साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ । पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ॥ पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा । चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ॥ पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि । भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं ॥ 2 ॥ प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा । तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ॥ पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ । उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ॥ अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन । भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन ॥ 3 ॥ ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो । कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ॥ विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर । परमानंद प्रकाश नाश, बिगदंड महाधर ॥ वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि । दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी ॥ 4 ॥

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