भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22 दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान । शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥ 4 ॥ दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण । शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥ 5 ॥ सृष्टि क्रम दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग । अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥ 6 ॥ ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार । भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥ 7 ॥ पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार । ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥ 8 ॥ पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार । दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥ 9 ॥ एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ । आगे पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥ 10 ॥ निरंजन निराकार है, ओंकार आकार । दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 11 ॥ आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि । दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥ 12 ॥ ईश्वर समर्थाई पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ । हिक मत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 13 ॥ यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार । पंचों का रस नाद है, दादू बोलनहार ॥ 14 ॥

  • 230 -