भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 अज्ञ स्वभाव अपलट सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग। दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥ दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि। उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥ सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ। दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥ कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास। दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि। दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग। दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ। दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल। मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥ सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ। दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥ दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ। गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥ अज्ञ स्वभाव अपलट बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि। दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥

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