भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 140. (गुजराती) अधीर उलाहन । त्रिताल धरणीधर बाह्या धूतो रे, अंग परस नहिं आपे रे । कह्यो अमारो कांई न माने, मन भावे ते थापे रे ॥ टेक ॥ वाही वाही ने सर्वस लीधो, अबला कोइ न जाणे रे । अलगो रहे येणी परि तेड़े, आपणड़े घर आणे रे ॥ 1 ॥ रमी रमी रे राम रजावी, केन्हों अंत न दीधो रे । गोप्य गुह्य ते कोई न जाणै, एह्वो अचरज कीधो रे ॥ 2 ॥ माता बालक रुदन करतां, वाही वाही ने राखे रे । जेवो छे तेवो आपणपो, दादू ते नहिं दाखै रे ॥ 3 ॥ 141. समर्थाई । राजमृगांक ताल सिरजनहार तैं सब होइ । उत्पत्ति परलै करै आपै, दूसर नांहीं कोइ ॥ टेक ॥ आप होइ कुलाल करता, बूँद तैं सब लोइ । आप कर अगोचर बैठा, दुनी मन को मोहि ॥ 1 ॥ आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ । बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज साँज समोइ ॥ 2 ॥ जे कुछ किया सु करै आपै, येह उपजै मोहि । दादू रे हरि नाम सेती, मैल कश्मल धोइ ॥ 3 ॥ 142. परिचय । राजमृगांक ताल देहुरे मंझे देव पायो, वस्तु अगोचर लखायो ॥ टेक ॥ अति अनूप ज्योति-पति, सोई अन्तर आयो । पिंड ब्रह्माण्ड सम, तुल्य दिखायो ॥ 1 ॥ सदा प्रकाश निवास निरंतर, सब घट मांहि समायो । नैन निरख नेरो, हिरदै हेत लायो ॥ 2 ॥ पूरव भाग सुहाग सेज सुख, सो हरि लैन पठायो ।

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