भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥ मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान । सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥ अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ । बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥ क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान । आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥ मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम । मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥ 175. परिचय विनती । जय मंगल ताल शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया । भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥ मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी । भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥ भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया । पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥ मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई । मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥ सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी । दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥ 176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल गोविन्द राखो अपणी ओट । काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥ बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।

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