भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 504 में से

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दादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥ 4 ॥ 319. निरंजन स्वरूप । त्रिताल निरंजन यूं रहै, काहू लिप्त न होइ । जल थल थावर जंगमा, गुण नहीं लागै कोइ ॥ टेक ॥ धर अंबर लागै नहिं, नहिं लागै शशिहर सूर । पाणी पवन लागै नहीं, जहाँ तहाँ भरपूर ॥ 1 ॥ निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम । क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥ 2 ॥ माया मोह लागै नहीं, नहिं लागै काया जीव । काल कर्म लागै नहीं, प्रगट मेरा पीव ॥ 3 ॥ इकलस एकै नूर है, इकलस एकै तेज । इकलस एकै ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 4 ॥ 320. विनय । त्रिताल जग जीवन प्राण आधार, वाचा पालना । हौं कहाँ पुकारूं जाइ, मेरे लालना ॥ टेक ॥ मेरे वेदन अंग अपार, सो दुख टालना । सागर यह निस्तार, गहरा अति घणा ॥ 1 ॥ अंतर है सो टाल, कीजै आपणा । मेरे तुम बिन और न कोइ, इहै विचारणा ॥ 2 ॥ तातैं करूं पुकार, यहु तन चालणा । दादू को दर्शन देहु, जाय दुख सालणा ॥ 3 ॥ 321. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।

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