सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
लोधीरामजी को वर प्राप्ति - बात वि. सं. 1600 में गुजरात के अहमदाबाद शहर की है । वहां श्री लोधीराम नागर ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े सम्पन्न, यशस्वी एवं साधु - संतों के परम भक्त थे । सब सुख होते हुए भी वे दुःखी रहा करते थे क्यों कि 40 - 50 वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी वे निस्संतान थे । एक दिन साबरमती नदी में स्नान करके नागरजी घर पर आ रहे थे तभी मार्ग में उन्हें एक परम दिव्यस्वरुप वाले संत के दर्शन हुए । ये महात्मा टापू पर तपस्या करने वाले उन तीन सिद्धों में से एक थे, जो भगवान के आदेशानुसार संसार का उद्धार करने के लिए वहां से चले थे । उन्हों ने नागरजी से कहा - “विप्रवर ! कल प्रातःकाल जब तुम स्नान करने के लिए जाओगे तब एक विशद कमल पुष्प तैरता हुआ तुम्हारे निकट आयेगा, उसमें एक दिव्य शिशु लेटा होगा । उसे उठा लेना, वही तुम्हारा पुत्र कहलाएगा ।” इतना कह कर वे संत अदृश्य होगए । लोधीरामजी संत का प्रकट होना, आदेश देना, और अदृश्य होना खड़े - खड़े देखते ही रह गए । कुछ क्षणों में प्रकृतिस्थ हुए, मानो सोकर जागे हों । फिर अत्यंत हर्षित हो जल्दी - जल्दी पैर बढाते हुए नागरजी घर को आए और धर्म - पत्नि को अपना अलौकिक अनुभव सुनाया । ऐसी विलक्षण घटना सुनकर वह भी भाव विभोर होगई और बोली - “दयासागर प्रभु ने हम पर बहुत बड़ी कृपा की । प्रभु ने हमारी कामना पूरी करदी ।” हर्षातिरेक के कारण लोधीरामजी को उस रात नींद नहीं आई । भावी संतान के सुख की कल्पना तरंगों में वे रात भर हिचकोले खाते रहे । प्रातःकाल होने के बहुत पहले ही वे उठ गए और दैनिक कार्यों से निपट कर स्नान करने के लिए साबरमती नदी की ओर चल पड़े । अभी पौ नहीं फटी थी । वातावरण में अंधेरा था, किन्तु नागरजी को सर्वत्र आशा प्रकाश छिटका हुआ दिखाई दे रहा था । उनकी चाल में पहले की तरह चिन्ता और उदासी नहीं थी, वरन पद - पद पर आनंद, उमंग तथा स्फूर्ति की झलक थी ।
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