सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुहप प्रेम बरसै सदा, हरि जन खेलैं फाग। ऐसा कौतुक देखिये, दादू मोटे भाग ॥ 110 ॥ परिचय रस अमृतधारा देखिए, पारब्रह्म बरषंत। तेज पुंज झिलमिल झरै, को साधु जन पीवंत ॥ 111 ॥ रस ही में रस बरषि है, धारा कोटि अनंत। तहाँ मन निश्चल राखिये, दादू सदा बसंत ॥ 112 ॥ घन बादल बिन बरषि है, नीझर निर्मल धार। दादू भीजै आत्मा, को साधु पीवनहार ॥ 113 ॥ ऐसा अचरज देखिया, बिन बादल बरषै मेह। तहँ चित चातक है रह्या, दादू अधिक स्नेह ॥ 114 ॥ महारस मीठा पीजिये, अविगत अलख अनन्त। दादू निर्मल देखिये, सहजैं सदा झरंत ॥ 115 ॥ परिचय कामधेनु कामधेनु दुहि पीजिये, अकल अनुपम एक। दादू पीवै प्रेम सौं, निर्मल धार अनेक ॥ 116 ॥ कामधेनु दुहि पीजिये, ताको लखै न कोइ। दादू पीवै प्यास सौं, महारस मीठा सोइ ॥ 117 ॥ कामधेनु दुहि पीजिये, अलख रूप आनन्द। दादू पीवै हेत सौं, सुखमन लागा बंद ॥ 118 ॥ कामधेनु दुहि पीजिये, अगम अगोचर जाइ। दादू पीवै प्रीति सूं, तेज पुंज की गाइ ॥ 119 ॥ कामधेनु करतार है, अमृत सरवै सोइ। दादू बछरा दूध को, पीवै तो सुख होइ ॥ 120 ॥ ऐसी एकै गाइ है, दूझै बारह मास। सो सदा हमारे संग है, दादू आतम पास ॥ 121 ॥