सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
भाव - विभोर होकर भीगे वस्त्रों से ही घर की ओर चले । घर में नागरजी की पत्नी स्नान कर शिशु सहित पति के आने की बाट जोह रही थी । नागरजी ने आकर शिशु को उसकी गोद में दिया । ऐसे तेजस्वी, मनोहर शिशु को देखकर वह हर्ष से भर गई । उसके हृदय में वात्सल्य भाव इतने वेग से उमड़ा कि दैवी कृपा से उसके स्तनों में दूध उतर आया । वे उस बालस्वरूप को देखते - देखते भाव विभोर हो गईं । उस शुभ दिन वि. सं. 1601 की फाल्गुन शुक्ल अष्टमी थी । कई दादू जीवनियों में उस दिन चैत्र शुक्ल अष्टमी भी बताते हैं । तत्पश्चात् अत्यंत लाड़ प्यार से बालक का पालन - पोषण होने लगा । बचपन से ही यह बालक तीव्र बुद्धि का तथा भगवद्भावों वाला था । असाधारण दयालुता उसका विशेष गुण था । उसकी इच्छा सदा दूसरों को देने की ही रहती थी, इसलिए उसका नाम दादू रख दिया गया । इस अवतरण प्रसंग को संतदासजी द्वारा रचित जन्मलीला में इस प्रकार वर्णित किया है - संवत सोलह सौ लागत ही, गुजरात धरा मधि अहमदाबाद्, ब्रह्म प्रकाश उदय भयो भानु जू, आय दुनि मध्य अवतरे दादू । हर्ष उछाह भयो तिहूँ लोक में, गावत यशश मुनि - सिद्ध - साधू, शेष, महेश, ब्रह्मा, ध्रुव में, सूर सुयशश करें संत आद् ॥ गैब को बालक आयो गगन थैं, नदी प्रवाह में खेलत पायो, पिछले प्रहर नहान गयो विप्र, बालक देखि उठाकर लायो । आपनी नारि को आन दियो घर, गैब को दूध प्रवाह बहायो, गावत मंगल नारि दसों दिश, बांट बधाई उछाह करायो ॥ सद्गुरु की प्राप्ति - बालक दादू की आयु सात वर्ष की हुई । एक दिन वे अन्य बालकों के साथ कांकरिया तालाब के कि नारे खेल रहे थे । तभी एक परमतेजस्वी संत सहसा वहां प्रगट हो गए । इस आकस्मिक घटना को
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