दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोच्छ्वासः] बालविनोधिनीव्याख्यासहितम्। २३५ शरक्षेपमिव गत्वा पुनः प्राचा पिण्डीभाण्डीरखण्डमण्डितोभयपार्श्वेन सैक- तपथेन किञ्चिदुत्तरमतिक्रम्य पुनरवाचीं चूतवीथीमगाहिषि। ततश्च गह- नतरमुदरोपरचितरत्नवेदिकं माधवीलतामण्डपमीषद्विवृतसमुद्गकोन्मिषि- तभासा दीपवर्त्या न्यरूपयम्। प्रविश्य चैकपार्श्वे फुल्लपुष्पनिरन्तरकुरण्ट- पोतपङ्क्तिभित्तिपरिगतं गर्भगृहम्, अवनिपतितारुणाशोकलतामयमभि- स्पर्शालभ्येति-स्पर्शेन लभ्यं लक्ष्यं विशालमतिमहत् यत् सौधकुड्यं प्रासादभित्ति- स्तस्योदरेण मध्यभागेन। शरक्षेपमिव बाणक्षेपपरिमितभूमिपर्यन्तम्। प्राचा-पूर्व- दिग्गामिना। पिण्डीभाण्डीरेति-पिण्डी-अशोकवृक्षो भाण्डीरो मल्लिका तयोः षण्डः समूहस्तेन मण्डितौ शोभितावुभयपार्श्वों यस्य तेन तथाविधेन। सैकतपथेन- बालुकामयमार्गेण। उत्तरं उत्तरदेशम्। अवाचीं-दक्षिणदिग्गामिनीम्। चूतवीथीं- रसालश्रेणीम्। अगाहिषि-प्राविशम्। गहनतरं-सान्द्रतरम्। उदरेति-उदरे मध्य- भागे उपरचिता निर्मिता रत्नवेदिका यस्मिन् तम्। लतामण्डपस्य विशेषणम्। ईषदिति-ईषदल्पं विवृत उद्घाटितो यः समुद्गकः सम्पुटकस्तेनोन्मिषिता निर्गता भा दीप्तिर्यस्यास्तया। दीपवर्त्या-प्रदीपदशया। न्यरूपयम्-अवलोकयम्। एक- पार्श्वे-एकस्मिन् प्रदेशे। फुल्लपुष्पेति-फुल्लं विकसितं पुष्पं कुसुमं येषां ते फुल्लपुष्पास्तेषां निरन्तराणां घनसंनिविष्टानां कुरण्टपोतानां कुरवकभेदानां पंक्तिः श्रेणिरेव भित्तिरावरrefणं तया परिगतं व्याप्तम्। गर्भगृहम् अभ्यन्तरगृहम्। अवनिपतितेति अवनौ भूमौ पतिता संलग्ना अरुणा रक्तवर्णा या अशोकलता वञ्जुलवल्ली तन्मयं तद्रचितमित्यर्थः। अभिनवेति-अभिनवा नूतनाः कुसुमकोरकाः दीवालें शोभायमान हैं उन दीवालोंके (ऊपर छाये हुए वृक्षोंकी शाखाओंके भीतरसे) बाणक्षेप प्रमाण भूमिके समीप गया। तत्पश्चात् पूर्वदिशाकी ओर मैं चला। जिस पूर्व- दिशामें वहाँकी भूमिपर दोनों ओर अशोकवृक्ष और मल्लिकावृक्षों की पंक्तियाँ राज रहीं थीं। पुनः मैं बालुकामय मार्गसे कुछ उत्तर दिशाको अतिक्रमण करके फिर अवाची दिशा (दक्षिण) की ओर चला। जिस दिशामें आमोंकी तरुश्रेणियाँ शोभित हो रही थीं। इसके अनन्तर अति गहन एवं जिसके मध्यमें रत्नोंसे जड़ी हुई एक वेदी बनी है ऐसे माधवीलतामण्डपको मैंने उस राजभवनके उपवनमें स्थित वृक्षों के सम्पुटोंमेंसे आये हुए थोड़े दीपकके प्रकाशसे देखा। उसमें प्रवेश करके मैंने अवलोकन किया कि उस मंडपके एक भागमें एक अभ्यन्तरगृह (वासगृह) है। जो वासगृह, अत्यन्त सान्द्र एवं प्रफुल्लित कुरवक वृक्षोंकी पंक्तियों से ढका हुआ है-जैसे आवरणसे कोई स्थान ढका रहता है। उस गर्भांगारके किवाड़ कैसे हैं-भूमितक संलग्न लाल अशोकवृक्षों की १६ द० कृ० उ०