दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंदितक्वणितरत्नमेखलागुणम्, अञ्चितोत्थितपृथुनितम्बविलम्बितविचेलदंशु- कोज्ज्वलम् , आकुञ्चितप्रसृतवेल्लितभुजलताऽभिहतललितकन्दुकम् आवर्जितबाहुपाशम् , उपरिपरिवर्तितत्रिकविलग्नलोलकुन्तलम् , (११) अवगलितकर्णपूरकनकपत्रप्रतिसमाधानशीघ्रतानतिक्रमितप्र- कृतक्रीडनम् , असकृदुत्क्षिप्यमाणहस्तपादबाह्याभ्यन्तरभ्रान्तकन्दुकम्, स्थानं प्रापितः शिखण्डभारः केशकलापो यत्र तथथा । समाघट्टितेति-समाघट्टितः सञ्चालितोऽत एव क्वणितः शब्दायमानो रत्नमेखलागुणः काञ्चीदाम यत्र तथथा । अञ्चितेति-अञ्चितं शोभनं यथा तथा उत्थितः पृथुर्विशालो यो नितम्बस्तत्र विल- म्बितं लग्नं विचल्लञ्चलं यदंशुकं वसनं तेन उज्ज्वलं मनोज्ञं यथा तथा । आकु- ञ्चितेति-आकुञ्चितया कदाचित् संक्षिप्यमाणया प्रसृतया कदाचित् प्रसार्यमाणया, वेल्लितया कदाचिच्च वक्रीकृतया भुजलयतया बाहुयष्ट्या अभिहतस्ताडितो ललितः सुन्दरः कन्दुको यत्र तथथा । आवर्जितेति-आवर्जितौ आनमितौ बाहू भुजौ पाशाविव यस्मिंस्तद्यथा तथा । उपरीति-उपरि ऊर्ध्वदेशे परिवर्त्तिते स्थिते त्रिके पृष्ठवंशाधोभागे विलग्नाः संबद्धा। लोलाश्चञ्चलाः कुन्तलाः केशा यस्मिंस्तद्यथा तथा। (११) अवगलितेति-अवगलितस्य स्वस्थानात् भ्रष्टस्य कर्णपूरस्यावतंसभू- तस्य कनकपत्रस्य तदाख्याभरणस्य प्रतिसमाधाने स्वस्थाननयने या शीघ्रता क्षिप्रहस्तता तया अनतिक्रमितमनुलङ्घितं प्रकृतं प्रारब्धं क्रीडनं यत्र यद्यथा तथा। असकृदिति-असकृद् वारंवारमुत्क्षिप्यमाणयोर्हस्तपाद्योर्बाह्याभ्यन्तरयोर्भ्रान्तः थे। वह राजकुमारी अपने कन्धेपर गिरे हुए केश कलापोंको यथास्थान धर रही थी। उस राजकुमारीकी रत्नजटित करधनीके दाने सञ्चालन करनेसे बज रहे थे। उस राजकुमारीके सुशोभित तथा उन्नत एवं विशाल नितम्बस्थलमें जो चञ्चल वस्त्र लटक रहा था उससे वह मनोज्ञ दीख रही थी। वह राजकुमारी अपनी भुजलताद्वारा जो कभी फैलती थी, कभी सिमटती थी, कभी तिरछी होतो थी उसके द्वारा वह सुन्दर गेंदको ताड़ित करती थी। वह राजकुमारी कभी कभी अपने भुजपाशोंको आनमित करतो थी। वह राजकुमारी अपने हाथोंको ऊपर परिवर्त्तित करती थी, जिसके कारण उसकी चञ्चल बालोंकी चोटियां जो उसके नितम्बभागतक लटक रही थीं चञ्चलायमान दीख रही थीं। (११) वह राजपुत्री अपने कानके अलङ्कारको जिसमें सुवर्ण पत्र लगे थे उन्हें अपने स्थानसे गिरनेपर फिर यथास्थान सजा लेती थी तथा उसे ऐसा करते हुए अपने कन्दुकके खेलमें जरा भी देर नहीं होती थी। बेर-बेर उस कन्दुकको हाथ पैरोंसे