भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 474 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 343

षष्ठोच्छ्वासः ] बालविबोधिनीव्याख्यासहितम् । ३४३ क्लान्तां चोद्वहन् वनं जगाहे । स्वमांसासृगपनीतक्षुत्पिपासां तां नयन्नन्तरे कमपि निकृत्तपाणिपादकर्णनासिकमवनिपृष्ठे विचेष्टमानं पुरुषमद्राक्षीत् । (२३) तमप्यार्द्रशयः स्कन्धेनोद्वहन्कन्दमूलमृगबहुले गहनोद्देशे यत्नरचितपर्णशालश्चिरमवसत् । अमुं च रोपितव्रणमिङ्गुदीतैलादिभिरा- मिषेण शाकेनात्मनिर्विशेषं पुपोष । पुष्टं च तमुद्रिक्तधातुमेकदा मृगान्वे- षणाय च प्रयाते धन्यके सा धूमिनी रिरंसयोपातिष्ठत । भर्त्सितापि तेन तम् । निकृत्तेति-निकृत्तं छिन्नं पाणिपादकर्णनासिकं यस्य तम् । प्राण्यङ्गत्वात् समा- हारः । अवनिपृष्ठे भूतले । विचेष्टमानं लुठन्तम् । (२३) तं पुरुषम् आर्द्रशयः दयायत्तचित्तः । कन्देति-कन्दानि मूलानि मृगा- श्च तैर्बहुले प्रचुरे पूर्णे इत्यर्थः । गहनोद्देशे काननप्रदेशे । यत्नेति-यत्नेन प्रयासेन रचिता निर्मिता पर्णशाला पर्णकुटी येन सः । चिरं दीर्घकालम् । अवसत् धन्यक इति शेषः । अमुं पुरुषम् । इङ्गुदीति-इङ्गुदी फलविशेषस्तस्य तैलं तदादिद्रव्येण रोपितव्रणं शुष्कक्षतम् । आमिषेण मांसेन । आत्मनिर्विशेषम् आत्मतुल्यम् । पुपोष वर्धयामास । उद्रिक्तधातुं पुष्टशरीरम् । रिरंसया रन्तुमिच्छया । उपातिष्ठत-तस्य पुरुषस्य समीपं गतवती । भर्त्सिता-सक्रोधं निवारिता । तेन पुरुषेण । बलात्कारं- बलपूर्वकम् । अरीरमत्-सुरतक्रीडामकरोत् । निवृत्तं वनात्प्रत्यागतम् । उदका- ढोकर किसी तरह एक गहन वनमें प्रविष्ट हुआ । रास्तेमें जब उसकी प्रियाको भूख-प्यास लगती थी, तो, वह धन्यक उसे अपने मांस-रक्तद्वारा यथाक्रम उसकी क्षुधा-तृषाकी शान्ति करता था । इसी प्रकार जब वह अपनी स्त्रीको लादे हुए चला जाता था, तब मार्गमें उसे एक अपरिचित लूला (पंगु) आदमी दिखाई दिया जो भूमिपर इधर-उधर लुढ़क रहा था । (२३) उस दयालु धन्यकने उस पंगुको भी कंधेपर लाद लिया और यत्नसे निर्मित फल-फूल और प्रचुर कन्दमूलवाले अरण्यकी कुटियामें उसे ले आया । वहांपर उसकी, इंगुदीके तैल आदि लगाकर, उसने पूरी तरहसे, सेवा-शुश्रूषा की जिससे उसके शरीरपरके सभी घाव (व्रण) सूख गये । साथ ही मांस और शाकादि वन्य खाद्य पदार्थों द्वारा उसका पालन-पोषण भी किया । एक दिन जब उस धूमिनीका पति हिरणोंकी गवेषणामें वनमें गया हुआ था, तब वह धूमिनी उस पुष्ट शरीर तथा स्तम्भित वीर्यवाले पंगुके समीप आयी और मैथुन (रति) करनेके लिये उससे कहने लगी । उस पंगुद्वारा तिरस्कृता होनेपर भी उस धूमिनीने उससे जबर्दस्ती रति क्रीड़ा की । जब उसका पति धन्यक वनसे लौटकर आया तब उसने (धन्यकने) उससे पीनेके लिए जल मांगा । इसपर उस कुलटाने Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu