दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF ४२२ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां कालो यस्य तिस्रस्त्रिपादोत्तरा नाडिकाः । सप्तमे चतुरङ्गबलप्रत्यवेक्षण- प्रयासः । अष्टमेऽस्य सेनापतिसखस्य विक्रमचिन्ताक्लेशः । पुनरुपास्यैव संध्याम्, प्रथमे रात्रिभागे गूढपुरुषा द्रष्टव्याः । तन्मुखेन चातिनृशंसाः शस्त्राग्निरसप्रणिधयोऽनुष्ठेयाः । द्वितीये भोजनानन्तरं श्रोत्रिय इव स्वा- ध्यायमारभेत । तृतीये तूर्यघोषेण संविष्टश्चतुर्थपञ्चमौ शयीत किल । कथ- मिवास्याजस्रचिन्तायासविह्वलमनसो वराकस्य निद्रासुखमुपनमेत । पुनः षष्ठे शास्त्रचिन्ताकार्यचिन्तारम्भः । सप्तमे तु मन्त्रग्रहो दूताभिप्रेषणानि च, दूताश्च नामोभयत्र प्रियाख्यानलब्धान् अनर्थान् वीतशुल्कबाधवर्त्मनि वणिज्यया वर्धयन्तः, कार्यमविद्यमानमपि लेशेनोत्पाद्यानवरतं भ्रमन्ति । प्रयोज्या इति भावः । तूर्यघोषेण नृपस्य शयनसमयसूचकेन वाद्यध्वनिना । संविष्टः शयितः । उपनमेत समीपमागच्छेत् । उभयत्र येन प्रेषितो यदन्तिकं प्रेषितश्च । वीतशुल्केति—वीता राजकीयपुरुषोऽयमिति कृत्वा अपगता शुल्कस्य भाषायां 'मासूल' इति ख्यातस्य बाधा यत्र तादृशे वर्त्मनि मार्गे । लेशेन कपटेन । सातवीं बात—राजाओको निरन्तर अपनी चतुरंगिणी सेनाका निरीक्षण करते रहनेका प्रयास करना पड़ता है। आठवीं बात—राजाओंको यह परमावश्यक होता है कि वे प्रधान सेनापतिको अपना मित्र बनाये रहें तथा अपनी शक्ति बढ़ानेकी सदा चेष्टायें करते रहें । सायंकालमें सन्ध्या-पूजनसे निवृत्ति प्राप्त करके रातके पहले पहरमें ही गुप्तचरोंसे वार्तालाप करनी चाहिए । तथा उनके कार्यों को देखना चाहिए । उनके द्वारा क्रूर, दुराचारियों के शस्त्रप्रहार, अग्निदाहकों या विषदाताओं एवं पापियों की गूढ़ चेष्टाओं का प्रतिकार कराना चाहिये । ज्योंही भोजनसे निवृत्ति पावें त्योंही वेदपाठियोंके समान पुस्तकें लेकर शास्त्रोंका मनन करें । संगीत एवं तुरही आदि वाद्योंके कोलाहलोंके कारण राजाओंको केवल चार-पाँच घड़ी सोनेके लिए प्राप्त होता है। इस कथित प्रकारसे जिनके चित्त नित्य क्लेश एवं चिन्ताओंसे पूर्ण रहेंगे, भला वे कैसे सुखकी नींद सो सकते हैं ! ज्योंही वे सोकर उठते हैं त्योंही उन्हें शास्त्रों और राजकार्योंकी चिन्तायें सताने लगती हैं । सचिवोंके साथ विचारविनिमय करके दूतोंको भेजनेके झमेले उनके समक्ष आकर उपस्थित होते हैं । वे दूत भी राजा-प्रजा दोनोंमें मीठी-मीठी बातें करके कहींसे धन लेते हैं तो कहीं चुङ्गीका महसूल माफ करा देते हैं और कहीं किसी वस्तुका व्यापार स्वयं ही करके अपना स्वार्थ साधते हैं । वास्तव में जिनकी कोई आवश्यकता भी नहीं होती उन छोटी-छोटी बातोंको वे लोग बढ़ा-चढ़ाकर अपने कार्यसाधनकी नित्य-नयी, व्यवस्था किया करते हैं तथा अपना कार्य निकाल लेते हैं । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu