दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५६ दशकुमारचरितम्। [ उत्तरपीठिकायां
इति स यद्वदिष्यति तदस्मि बोध्यः' इति । सोऽन्येद्युर्मामावेदयत्— 'मुहुरुपास्य प्राभृतैः, प्रवर्त्य चित्राः कथाः, संवाह्य पाणिपदम् , अतिवि- स्रम्भदत्तक्षणं तमप्राक्षं त्वदुपदिष्टेन नयेन । सोऽप्येवमकथयत्—'भद्र, मैवं वादीः । अभिजनस्य शुद्धिदर्शनम्, असाधारणं बुद्धिनैपुण्यम्, अप- रिमाणमौदार्यम् , अत्याश्चर्यमस्त्रकौशलम् , अनल्पं शिल्पज्ञानम् , अनुग्र- हार्द्रं चेतः, तेजश्चाप्यविषह्यमभ्यमित्रीणम् , इत्यस्मिन्नेव संनिपातिनो गुणाः येऽन्यत्रैकैकशोऽपि दुर्लभाः । द्विषतामेष चिरबिल्वद्रुमः, प्रह्लाणं
अन्यदिवसे । प्राभृतैरुपायनैः । प्रवर्त्य आरभ्य । संवाह्य मर्दयित्वा । अतिवि- स्रम्भेनाधिकविश्वासेन दत्तोऽर्पितः क्षणो येन तम् आर्यकेतुम् । अप्राक्षमिति प्रच्छधातोर्लुङि रूपम् । त्वया भवतोपदिष्टेन कथितेन । नयेन मार्गेण प्रकारेण वा । अभिजनस्य कुलस्य । शुद्धेर्वैमल्यस्य दर्शकं ज्ञापकम् । अतिमानुषमलौकिकम् । अनुग्रहेण दयया आर्द्रं स्निग्धम् । तेजः प्रतापः । अभ्यमित्रीणं शत्रून् प्रति प्रकटि- तमिति तेजोविशेषणम् । अविषह्यं परैः सोढुमशक्यम् । अस्मिन् विश्रुते इत्यर्थः । सन्निपातिनः एकत्रावस्थायिनः । ये गुणाः । अन्यत्र अपरपुरुषे । एकैकश इति— सम्भूयावस्थानं तु दूरे, प्रत्येकमेकोऽपि दुर्लभ इत्यर्थः । चिरबिल्वद्रुमः करञ्जवृक्षः, अनम्रः कण्टकाकीर्णश्च भवतीति तत्तादात्म्यारोपः । प्रह्नानां नम्राणाम् । चन्दनतरु-
उपभोग कर रहा है। इस दुष्ट ने हमारे कुमार के ऊपर जैसे मंत्र कर दिया है। आखिरकार यह कुमार को छोड़ेगा वा खा जायगा । इसका वह जो प्रत्युत्तर दे वह बात हमसे बताना । इसके बाद दूसरे दिन नालीजंघ ने आकर कहा—हे महाभाग ! आपके आदेशानुसार हम मन्त्री आर्यकेतु के समीप गये । विविध उपहारों से उनकी अर्चा की। कई प्रकार की भेंटें समर्पित की तथा अनेक रीति से वार्तालाप किया और हाथ-पाँव दाबे । इस रीति से उन्हें प्रसन्न कर आप की बतायी नीति से हमने उनसे पूछा तब उन्होंने यह उत्तर दिया—'हे भद्र ! ऐसा न कहिये । उसके द्वारा राजकुल प्रफुल्लित होगा । उसकी प्रशंसनीय प्रतिभा है। उसमें महत् शौर्य है। श्लाघ्य शस्त्रकौशल के साथ ही उसमें अनुपम त्याग है। करुणार्द्र चित्त के साथ ही उसमें अतुलित शिल्प कला का ज्ञान है। उसका तेज अति देदीप्यमान है, शत्रु उसे सह नहीं सकते । वह बड़ी वीरता के साथ शत्रुओं से लड़ सकता है। मेरे मत से तो उसमें वे सभी गुण हैं जो साधारणतः मनुष्यों में नहीं पाये जाते, देवों में पाये जाते हैं। वह रिपुओं के लिए कण्टकाकीर्ण तरु है तथा मित्रों और दयापात्रों के लिए चन्दन के वृक्ष के समान है। इसी ने उस नीति-