भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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६६ दशकुमारचरितम् । [ पूर्वपीठिकायां दुरवस्थानुभूयते । कथ्यताम्' इति । (७) सा सगद्गदमवादीत्—'पुत्र, कालयवनद्वीपे कालगुप्तनाम्नो व- णिजः कस्यचिदेषा सुता सुवृत्ता नाम रत्नोद्भवेन निजकान्तेनागच्छन्ती जलधौ मग्ने प्रवहणे निजधात्र्या मया सह फलकमेकमवलम्ब्य दैवयोगेन कूलमुपेतासन्नप्रसवसमया कस्याञ्चिदटव्यामात्मजमसूत । मम तु मन्दभा- ग्यतया बाले वनमातङ्गेन गृहीते मद्द्वितीया परिभ्रमन्ती 'षोडशवर्षानन्तरं भर्तृपुत्रसङ्गमो भविष्यति' इति सिद्धवाक्यविश्वासादेकस्मिन्पुण्याश्रमे तावन्तं समयं नीत्वा शोकमपारं सोढुमक्षमा समुज्ज्वलिते वैश्वानरे शरी- रमाहुतीकर्तुमुद्युक्तासीत्' इति । कारणेन । दुरवस्था एतादृशी दुर्दशा । अनुभूयते भवतीभ्यामिति शेषः । (७) सा वृद्धा। सगद्गदं बाष्परुद्धकण्ठम् । निजकान्तेन स्वभर्त्रा । फलकं काष्ठ- खण्डम् । कूलं तीरमुपेता प्राप्ता । आसन्नः प्राप्तः प्रसवसमयो यया सा । मन्दभाग्य- तया दुरदृष्टवशेन । बाले शिशौ । वनमातङ्गेन आरण्यगजेन । मद्द्वितीया अहं द्वितीया यस्याः सा मच्छरणेत्यर्थः । तावन्तं षोडशवर्षमितम् । नीत्वा यापयित्वा । अपारं अनन्तम् । अक्षमा असमर्था । समुज्ज्वलिते प्रज्वलिते । आहुतीकर्त्तुं प्रक्षेप्तुं भस्मसात्कर्तुमित्यर्थः । बैठी थी उसे और उस वनिताको लेकर अपने पिताके पास आया और पिता के सामने ही वृद्धासे उसके अग्निप्रवेशका कारण पूछा- हे वृद्धे ! तुम दोनों कौन हो तथा क्योंकर आगमें यहाँ प्रविष्ट हो रही थीं ? और तुम लोग कहाँकी निवासिनी हो । इस अरण्यमें क्यों कष्ट सह रही हो ? (७) वह वृद्धा गद्गद स्वरमें बोली-'हे पुत्र ! कालयवनद्वीपमें कालगुप्त नामक एक वणिक् रहता था। उसकी सुवृत्ता नामक यह कन्या है । यह कन्या अपने पति रत्नोद्भवके साथ नावपर आ रही थी। दैववश नाव, बीच समुद्रमें, टूटकर डूब गयी । धात्रीभावसे नियुक्त मैं और यह कन्या एक काठके सहारे समुद्रतटपर आ लगीं । यह आसन्नप्रसवा थी । अतः इसने पास ही के विपिनमें एक पुत्र उत्पन्न किया । दुर्भाग्यसे एक जंगली हाथी उस बालकको उठा ले गया । मेरे साथ विलपती हुई यह एक तपस्वीके समीप गयी । उनके उप- देशपूर्ण कथनपर कि १६ वर्षमें तुम्हारे पति-पुत्र मिल जायेंगे यह कन्या मेरे साथ एक पवित्र आश्रममें निवासकर जीवन-यापन करने लगी । परन्तु १६ वर्ष होनेपर भी जब इसे पति- पुत्र न मिले तो यह अपार शोक-सागर पार करनेमें ,चिन्तित हो गयी और इस जलती हुई आगमें प्रवेश करनेके लिए तैयार हो गयी ।