भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 238
अ० ११]द्वितीय स्कन्ध२२९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पौरा जानपदा लोकाश्चक्रुस्तं नृपतिं शिशुम्।<br>जनमेजयनामानं राजलक्षणसंयुतम्॥ ६पुरवासी तथा जनपदवासी प्रजाओंने राजलक्षणोंसे सम्पन्न जनमेजय नामक उस बालकको अपने राजाके रूपमें स्वीकार किया॥ ६॥
धात्रेयी शिक्षयामास राजचिह्नानि सर्वशः।<br>दिने दिने वर्धमानः स बभूव महामतिः॥ ७राजकुमारकी धात्रीने उन्हें सब प्रकारके राजोचित गुणोंकी शिक्षा दी। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होते हुए वे महान् बुद्धिमान् हो गये॥ ७॥
प्राप्ते चैकादशे वर्षे तस्मै कुलपुरोहितः।<br>यथोचितां ददौ विद्यां जग्राह स यथोचिताम्॥ ८उनकी ग्यारह वर्षकी अवस्था होनेपर कुल-पुरोहितने उन्हें यथोचित शिक्षा प्रदान की और उन्होंने उसे सम्यक् रूपसे ग्रहण किया॥ ८॥
धनुर्वेदं कृपः पूर्णं ददावस्मै सुसंस्कृतम्।<br>अर्जुनाय यथा द्रोणः कर्णाय भार्गवो यथा॥ ९जिस प्रकार द्रोणाचार्यने अर्जुनको तथा भार्गव परशुरामने कर्णको धनुर्विद्यामें प्रशिक्षित किया, उसी प्रकार कृपाचार्यने जनमेजयको भलीभाँति परिष्कृत धनुर्विद्या प्रदान की॥ ९॥
सम्प्राप्तविद्यो बलवान्बभूव दुरतिक्रमः।<br>धनुर्वेदे तथा वेदे पारगः परमार्थवित्॥ १०इस प्रकार सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करके वे जनमेजय वेद तथा धनुर्वेदमें पूर्ण पारंगत, बलशाली, अपराजेय तथा परमार्थवेत्ता हो गये॥ १०॥
धर्मशास्त्रार्थकुशलः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>चकार राज्यं धर्मात्मा पुरा धर्मसुतो यथा॥ ११वे धर्मशास्त्रके अर्थोंका विवेचन करनेमें कुशल, सत्यनिष्ठ, इन्द्रियजित् और धर्मात्मा थे। उन्होंने पूर्वमें धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरकी भाँति राज्य-शासन किया॥ ११॥
ततः सुवर्णवर्माख्यो राजा काशिपतिः किल।<br>वपुष्टमां शुभां कन्यां ददौ पारीक्षिताय च॥ १२इसके बाद सुवर्णवर्मा नामवाले काशिपति राजाने शुभ गुणोंवाली अपनी कन्या वपुष्टमाका पाणिग्रहण जनमेजयके साथ सम्पन्न कर दिया॥ १२॥
स तां प्राप्यासितापाङ्गीं मुमुदे जनमेजयः।<br>काशिराजसुतां कान्तां प्राप्य राजा यथा पुरा॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यो मुमुदे सुभद्रां च यथार्जुनः।<br>विजहार महीपालो वनेषूपवनेषु च॥ १४<br><br>तया कमलपत्राक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>प्रजास्तस्य सुसन्तुष्टा बभूवुः सुखलालिताः॥ १५<br><br>मन्त्रिणः कर्मकुशलाश्चक्रुः कार्याणि सर्वशः।जिस प्रकार प्राचीन कालमें काशिराजकी पुत्रीको पाकर विचित्रवीर्य तथा सुभद्राको पाकर अर्जुन अत्यन्त आह्लादित हुए थे, उसी प्रकार उस श्याम नयनोंवालीको अपनी कान्ताके रूपमें पाकर जनमेजय अति प्रसन्न हुए। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस वपुष्टमाके साथ वनों और उपवनोंमें राजा जनमेजय उसी प्रकार विहार करने लगे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। उनके द्वारा सुखपूर्वक रक्षित प्रजा अति सन्तुष्ट थी। जनमेजयके कार्यकुशल सभी मन्त्री समस्त कार्योंको सम्यक् प्रकारसे करते थे॥ १३-१५ १/२॥