देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 242, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 242
| अ० ११] | द्वितीय स्कन्ध | २३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम्।<br>वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु॥ ५१<br><br>तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः।<br>तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः॥ ५२<br><br>शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः। | आपलोग उसमें आज ही यज्ञके लिये वेदीका भी निर्माण सम्पन्न करा लें। उस यज्ञके अंगरूपमें विस्तारसहित सर्पसत्र भी करना है। महामुनि उतंक उस यज्ञके होता होंगे और तक्षकनाग उसमें यज्ञपशु होगा। आपलोग शीघ्र ही सर्वज्ञाता एवं वेदपारगामी ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करें॥ ४९—५२ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः॥ ५३<br><br>यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम्।<br>हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः॥ ५४<br><br>इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत्।<br>भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च॥ ५५ | **सूतजी बोले—**बुद्धिमान् मन्त्रियोंने राजाके कथनानुसार यज्ञसम्बन्धी समस्त सामग्रीका प्रबन्ध कर लिया और विस्तृत यज्ञवेदी भी निर्मित करायी। सर्पोंका हवन आरम्भ होनेपर तक्षक इन्द्रके यहाँ गया और उनसे बोला—मैं भयाकुल हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। तत्पश्चात् इन्द्रने उस भयभीत तक्षकको सान्त्वना देकर अपने आसनपर बैठाकर उसे अभय प्रदान किया और कहा—हे पन्नग! तुम निर्भय हो जाओ॥ ५३—५५ १/२॥ |
| ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग।<br>तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा॥ ५६<br><br>उत्तङ्कोऽह्वयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम्।<br>स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः॥ ५७<br><br>आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः।<br>तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम्॥ ५८ | तदनन्तर उतंकमुनि उस तक्षकको इन्द्रका शरणागत और उनसे अभयदान पाया हुआ जानकर उद्विग्न हो उठे और उन्होंने मन्त्रप्रभावसे इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब तक्षकने यायावरवंशमें उत्पन्न जरत्कारुपुत्र धर्मनिष्ठ आस्तीक-नामक मुनिका स्मरण किया। वे मुनिबालक आस्तीक वहाँ आकर जनमेजयकी प्रशंसा करने लगे॥ ५६—५८॥ |
| राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम्।<br>अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः॥ ५९ | राजा जनमेजयने उस बालकको महान् पण्डित देखकर उसकी पूजा की। पूजन-अर्चन करके राजाने अपनी मनोवांछित वस्तु माँगनेके लिये उससे निवेदन किया॥ ५९॥ |
| स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति।<br>सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा॥ ६० | तब आस्तीकने याचना की—हे महाभाग! इस यज्ञको समाप्त किया जाय। उसने सत्य वचनमें आबद्ध राजासे बार-बार ऐसी प्रार्थना की॥ ६०॥ |
| होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः।<br>भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात्॥ ६१ | तत्पश्चात् मुनिके वचनानुसार राजाने सर्पोंका हवन बन्द कर दिया और फिर वैशम्पायनऋषिने उन्हें विस्तारपूर्वक महाभारतकी कथा सुनायी॥ ६१॥ |
| श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान्।<br>व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत्॥ ६२ | उस कथाको सुनकर भी राजाको विशेष शान्ति नहीं प्राप्त हुई तब राजाने व्यासजीसे पूछा—मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? मेरा मन अशान्तिकी |