देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 247, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 247
| २३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम्।<br>अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम्॥ ३६ | जरत्कारुमुनिने उसे अपने ही समान नामवाली जानकर उनसे कहा—जब भी यह मेरा अप्रिय करेगी, तब मैं इसका परित्याग कर दूँगा॥ ३६॥ |
| वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयं।<br>दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह॥ ३७ | वैसी प्रतिज्ञा करके जरत्कारुमुनिने उस जरत्कारुको पत्नीरूपसे ग्रहण कर लिया। वासुकिनाग भी अपनी बहन उन्हें प्रदानकर आनन्दपूर्वक अपने घर लौट गये॥ ३७॥ |
| कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने।<br>तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप॥ ३८ | हे परन्तप! मुनि जरत्कारु उस महावनमें सुन्दर पर्णकुटी बनाकर उसके साथ रमण करते हुए सुख भोगने लगे॥ ३८॥ |
| एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः।<br>भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी॥ ३९<br><br>न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन।<br>इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा॥ ४० | एक समय मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु भोजन करके विश्राम कर रहे थे, वासुकिकी बहन सुन्दरी जरत्कारु भी वहीं बैठी हुई थी। [मुनिने उससे कहा] हे कान्ते! तुम मुझे किसी भी प्रकार जगाना मत—उस सुन्दर दाँतोंवालीसे ऐसा कहकर वे मुनि सो गये॥ ३९-४०॥ |
| रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते।<br>किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः॥ ४१<br><br>धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत्।<br>नोचेत्प्रबोधयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत्॥ ४२ | सूर्य अस्ताचलको प्राप्त हो गये थे। सन्ध्या-वन्दनका समय उपस्थित हो जानेपर धर्मलोपके भयसे डरी हुई जरत्कारु सोचने लगी—मैं क्या करूँ? मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। यदि मैं इन्हें जगाती हूँ तो ये मेरा परित्याग कर देंगे और यदि नहीं जगाती हूँ तो यह सन्ध्याकाल व्यर्थ ही चला जायगा॥ ४१-४२॥ |
| धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम्।<br>धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः॥ ४३<br><br>इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत्।<br>सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुव्रत॥ ४४ | धर्मनाशकी अपेक्षा त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है ही। धर्मके नष्ट होनेपर मनुष्योंको निश्चित ही नरकमें जाना पड़ता है—ऐसा निश्चय करके उस स्त्रीने उन मुनिको जगाया और कहा—हे सुव्रत! उठिये, उठिये, अब सन्ध्याकाल भी उपस्थित हो गया है॥ ४३-४४॥ |
| उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम्।<br>त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी॥ ४५ | जगनेपर मुनि जरत्कारुने क्रोधित होकर उससे कहा—अब मैं जा रहा हूँ और मेरी निद्रामें विघ्न डालनेवाली तुम अपने भाई वासुकिके घर चली जाओ॥ ४५॥ |