देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 260, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 260
| अ० ३ ] | तृतीय स्कन्ध | २५१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कोऽहं कोऽयं किमर्थं वा भ्रमोऽयं मम चेश्वरौ।<br>क्षणादथ विमानं तच्चाचालाशु मनोजवम् ॥ १८ | हे ईश्वरो! मैं कौन हूँ, ये कौन हैं और हम दोनोंका क्या प्रयोजन है? इसमें मैं भ्रमित हूँ। थोड़ी ही देरमें वह विमान पुनः मनके सदृश वेगसे आगेकी ओर बढ़ा॥ १८॥ |
| कैलासशिखरे प्राप्तं रम्ये यक्षगणान्विते।<br>मन्दारवाटिकारम्ये कीरकोकिलकूजिते ॥ १९<br><br>वीणामुरजवाद्यैश्च नादिते सुखदे शिवे।<br>यदा प्राप्तं विमानं तत्तदैव सदनाच्छुभात् ॥ २०<br><br>निर्गतो भगवान्छम्भुर्वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>पञ्चाननो दशभुजः कृतसोमार्थशेखरः ॥ २१ | तत्पश्चात् वह विमान यक्षगणोंसे सुशोभित, मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंके कारण अति सुरम्य, शुक और कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजित, वीणा और मृदंग आदि वाद्य-यन्त्रोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित, सुखदायक तथा मंगलकारी कैलास-शिखरपर पहुँचा॥ १९ १/२ ॥<br><br>उस शिखरपर जब वह विमान पहुँचा; उसी समय वृषभपर आरूढ, पंचमुख, दस भुजाओंवाले, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए भगवान् शंकर अपने दिव्य भवनसे बाहर निकले॥ २०-२१॥ |
| व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरीयकः।<br>पार्ष्णिरक्षौ महावीरो गजाननषडाननौ ॥ २२ | उस समय वे व्याघ्रचर्म पहने हुए तथा गजचर्म ओढ़े हुए थे। महाबली गजानन (श्रीगणेश) तथा षडानन (कार्तिकेय) उनके अंगरक्षकके रूपमें विद्यमान थे॥ २२॥ |
| शिवेन सह पुत्रौ द्वौ व्रजमानौ विरेजतुः।<br>नन्दिप्रभृतयः सर्वे गणपाश्च वराश्च ते ॥ २३<br><br>जयशब्दं प्रयुञ्जाना व्रजन्ति शिवपृष्ठगाः।<br>तं वीक्ष्य शङ्करं चान्यं विस्मितास्तत्र नारद ॥ २४<br><br>मातृभिः संशयाविष्टस्तत्राहं न्यवसं मुने।<br>क्षणात्तस्माद् गिरेः शृङ्गाद्विमानं वातरंहसा ॥ २५<br><br>वैकुण्ठसदनं प्राप्तं रमारमणमन्दिरम्।<br>असम्भाव्या विभूतिश्च तत्र दृष्टा मया सुत ॥ २६ | भगवान् शंकरके साथ चल रहे उनके दोनों पुत्र अतीव सुशोभित हो रहे थे। नन्दी आदि सभी प्रधान शिवगण जयघोष करते हुए भगवान् शिवके पीछे-पीछे चल रहे थे। हे नारद! वहाँ अन्य लोगों तथा शंकरको मातृकाओंसहित देखकर हमलोग विस्मयमें पड़ गये और हे मुने! मैं संशयग्रस्त हो गया। थोड़ी ही देरमें वह विमान उस कैलास-शिखरसे वायुगतिसे लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुके वैकुण्ठलोकमें जा पहुँचा। हे पुत्र! मैंने वहाँ अद्भुत विभूतियाँ देखीं॥ २३-२६॥ |
| विसिष्मिये तदा विष्णुर्दृष्ट्वा तत्पुरमुत्तमम्।<br>सदनाग्रे ययौ तावद्धरिः कमलोचनः ॥ २७ | उस अति रमणीक नगरको देखकर भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये। उसी समय कमलोचन भगवान् विष्णु अपने भवनसे बाहर निकले॥ २७॥ |
| अतसीकुसुमाभासः पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>द्विजराजाधिरूढश्च दिव्याभरणभूषितः ॥ २८<br><br>वीज्यमानस्तदा लक्ष्म्या कामिन्या चामरैः शुभैः।<br>तं वीक्ष्य विस्मिताः सर्वे वयं विष्णुं सनातनम् ॥ २९ | उनका वर्ण अलसीके पुष्पकी भाँति श्याम था, वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे पक्षिराज गरुडपर आरूढ़ थे और दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे। भगवती लक्ष्मी उन्हें शुभ चँवर डुला रही थीं। उन सनातन भगवान् विष्णुजीको देखकर हम सभीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २८-२९॥ |