देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 276, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 276
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यथाद्दीपस्तथोपाधेर्योगत्सञ्जायते द्विधा।<br>छायेवादर्शमध्ये वा प्रतिबिम्बं तथावयोः॥ ५ | जिस प्रकार एक ही दीपक उपाधिभेदसे दो प्रकारका दिखायी देता है अथवा दर्पणमें पड़ती हुई छाया दर्पणभेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं और ब्रह्म एक होते हुए भी उपाधिभेदसे अनेक हो जाते हैं॥ ५॥ |
| भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थं प्रभवत्यज।<br>दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥ ६ | हे अज! जगत्का निर्माण करनेके लिये सृष्टिकालमें भेद दिखता ही है। तब दृश्यादृश्यकी प्रतीति होना अनिवार्य ही है; क्योंकि बिना दोके सृष्टि होना असम्भव है॥ ६॥ |
| नाहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये।<br>सर्गे सति विभेदः स्यात्कल्पितोऽयं धिया पुनः॥ ७ | सृष्टिके प्रलयकालमें मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ। परंतु जब पुनः सृष्टि होने लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धिके द्वारा उत्पन्न हो जाता है॥ ७॥ |
| अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।<br>श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥ ८<br><br>कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जराजरा।<br>विद्याविद्या स्पृहा वाञ्छा शक्तिश्चाशक्तिरेव च॥ ९<br><br>वसा मज्जा च त्वक्चाहं दृष्टिर्वागनृतानृता।<br>परा मध्या च पश्यन्ती नाड्योऽहं विविधाश्च याः॥ १० | मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि वाणीके भेद और जो विभिन्न प्रकारकी नाड़ियाँ हैं—वह सब मैं ही हूँ॥ ८-१०॥ |
| किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।<br>सर्वमेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज॥ ११ | हे पद्मयोने! आप यह देखिये कि इस संसारमें मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे पृथक् कौन-सी वस्तु है? इसलिये आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि सब कुछ मैं ही हूँ॥ ११॥ |
| एतैर्मे निश्चितै रूपैर्विहीनं किं वदस्व मे।<br>तस्मादहं विधे चास्मिन्सर्गे वै वितताभवम्॥ १२ | हे विधे! मेरे इन निश्चित रूपोंके अतिरिक्त यदि कुछ हो तो मुझे बतायें, अतः इस सृष्टिमें सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ॥ १२॥ |
| नूनं सर्वेषु देवेषु नानानामधरा ह्यहम्।<br>भवामि शक्तिरूपेण करोमि च पराक्रमम्॥ १३<br><br>गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा।<br>वारुणी चाथ कौबेरी नारसिंही च वासवी॥ १४<br><br>उत्पन्नेषु समस्तेषु कार्येषु प्रविशामि तान्।<br>करोमि सर्वकार्याणि निमित्तं तं विधाय वै॥ १५ | निश्चित ही मैं समस्त देवताओंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे विराजती हूँ तथा शक्तिरूपसे प्रकट होती हूँ और पराक्रम करती हूँ। मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासवी शक्तिके रूपमें विद्यमान हूँ। सब कार्योंके उपस्थित होनेपर मैं उन देवताओंमें प्रविष्ट हो जाती हूँ और देवविशेषको निमित्त बनाकर सब कार्य सम्पन्न कर देती हूँ॥ १३-१५॥ |
| जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे।<br>निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा॥ १६ | जलमें शीतलता, अग्निमें उष्णता, सूर्यमें प्रकाश और चन्द्रमामें ज्योत्स्नाके रूपमें मैं ही यथेच्छ प्रकट होती हूँ॥ १६॥ |