भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 291
२८२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजसादर्थसंवृद्धिस्तथा भोगस्तु राजसः।<br>सत्त्वं विनिर्गतं तेन तमसश्चापि निग्रहः॥ ३८रजोगुण बढ़नेसे धनकी वृद्धि होती है और भोग भी राजसी हो जाता है। उस दशामें सत्त्वगुण दूर चला जाता है और उससे तमोगुण भी दब जाता है॥ ३८॥
यदा तमो विवृद्धं स्यादुत्कटं सम्बभूव ह।<br>तदा वेदे न विश्वासो धर्मशास्त्रे तथैव च॥ ३९<br><br>श्रद्धां च तामसीं प्राप्य करोति च धनात्ययम्।<br>द्रोहं सर्वत्र कुरुते न शान्तिमधिगच्छति॥ ४०<br><br>जित्वा सत्त्वं रजश्चैव क्रोधनो दुर्मतिः शठः।<br>वर्तते कामचारेण भावेषु विततेषु च॥ ४१जब तमोगुणकी वृद्धि होती है और वह उत्कट हो जाता है, तब वेद तथा धर्मशास्त्रमें विश्वास नहीं रह जाता। उस समय मनुष्य तामसी श्रद्धा प्राप्त करके धनका दुरुपयोग करता है, सबसे द्रोह करने लगता है तथा उसे शान्ति नहीं मिलती। वह क्रोधी, दुर्बुद्धि तथा दुष्ट मनुष्य सत्त्व तथा रजोगुणको दबाकर अनेकविध तामसिक विचारोंमें लीन रहता हुआ मनमाना आचरण करने लगता है॥ ३९-४१॥
एकं सत्त्वं न भवति रजश्चैकं तमस्तथा।<br>सहैवाश्रित्य वर्तन्ते गुणा मिथुनधर्मिणः॥ ४२किसी भी प्राणीमें सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण अकेले नहीं रहते; अपितु मिश्रित धर्मवाले वे तीनों गुण एक-दूसरेके आश्रयीभूत होकर रहते हैं॥ ४२॥
रजो विना न सत्त्वं स्याद्रजः सत्त्वं विना क्वचित्।<br>तमो विना न चैवैते वर्तन्ते पुरुषर्षभ॥ ४३<br><br>तमस्ताभ्यां विहीनं तु केवलं न कदाचन।<br>सर्वे मिथुनधर्माणो गुणाः कार्यान्तरेषु वै॥ ४४हे पुरुषश्रेष्ठ! रजोगुणके बिना सत्त्वगुण और सत्त्वगुणके बिना रजोगुण कदापि रह नहीं सकते। इसी प्रकार तमोगुणके बिना ये दोनों गुण नहीं रह सकते। इस प्रकार ये गुण परस्पर स्थित रहते हैं। सत्त्वगुण तथा रजोगुणके बिना तमोगुण नहीं रहता; क्योंकि इन मिश्रित धर्मवाले सभी गुणोंकी स्थिति कार्य-कारण-भावसे विभिन्न प्रकारकी होती है॥ ४३-४४॥
अन्योन्यसंश्रिताः सर्वे तिष्ठन्ति न वियोजिताः।<br>अन्योन्यजनकाश्चैव यतः प्रसवधर्मिणः॥ ४५ये सभी गुण अन्योन्याश्रयभावसे विद्यमान रहते हैं, अलग-अलग भावसे नहीं। प्रसवधर्मी होनेके कारण ये एक-दूसरेके उत्पादक भी होते हैं॥ ४५॥
सत्त्वं कदाचिच्च रजस्तमसी जनयत्युत।<br>कदाचित्तु रजः सत्त्वतमसी जनयत्यपि॥ ४६<br><br>कदाचित्तु तमः सत्त्वरजसी जनयत्युभे।<br>जनयन्त्येवमन्योन्यं मृत्पिण्डश्च घटं यथा॥ ४७सत्त्वगुण कभी रजोगुणको और कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है; इसी तरह रजोगुण कभी सत्त्वगुणको तथा कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है। इसी प्रकार तमोगुण कभी सत्त्वगुणको एवं कभी रजोगुणको भी उत्पन्न करता है। ये तीनों गुण आपसमें एक-दूसरेको उसी प्रकार उत्पन्न कर देते हैं, जिस प्रकार मिट्टीका लोंदा घड़ेको उत्पन्न कर देता है॥ ४६-४७॥
बुद्धिस्थास्ते गुणाः कामान्बोधयन्ति परस्परम्।<br>देवदत्तविष्णुमित्रयज्ञदत्तादयो यथा॥ ४८मनुष्योंकी बुद्धिमें स्थित ये तीनों गुण परस्पर कामनाओंको उसी प्रकार जाग्रत् करते हैं; जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त आदि मिलकर काम करते हैं॥ ४८॥