देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शरद्वसन्तनामानौ दुर्गमौ प्राणिनामिह।<br>तस्माद्यत्नादिदं कार्यं सर्वत्र शुभमिच्छता॥ ५ | शरत् तथा वसन्त नामक ये दोनों ऋतुएँ संसारमें प्राणियोंके लिये दुर्गम हैं। अतएव आत्मकल्याणके इच्छुक व्यक्तिको बड़े यत्नके साथ यह नवरात्रव्रत करना चाहिये॥ ५॥ |
| द्वावेव सुमहाघोरावृतू रोगकरौ नृणाम्।<br>वसन्तशरदावेव सर्वनाशकरावुभौ॥ ६<br><br>तस्मात्तत्र प्रकर्तव्यं चण्डिकापूजनं बुधैः।<br>चैत्राश्विने शुभे मासे भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ७ | ये वसन्त तथा शरद्—दोनों ही ऋतुएँ बड़ी भयानक हैं और मनुष्योंके लिये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं। ये सबका विनाश कर देनेवाली हैं। अतएव हे राजन्! बुद्धिमान् लोगोंको शुभ चैत्र तथा आश्विनमासमें भक्तिपूर्वक चण्डिकादेवीका पूजन करना चाहिये॥ ६-७॥ |
| अमावास्यां च सम्प्राप्य सम्भारं कल्पयेच्छुभम्।<br>हविष्यं चाशनं कार्यमेकभुक्तं तु तद्दिने॥ ८ | अमावस्या आनेपर व्रतकी सभी शुभ सामग्री एकत्रित कर ले और उस दिन एकभुक्त व्रत करे और हविष्य ग्रहण करे॥ ८॥ |
| मण्डपस्तु प्रकर्तव्यः समे देशे शुभे स्थले।<br>हस्तषोडशमानेन स्तम्भध्वजसमन्वितः॥ ९ | किसी समतल तथा पवित्र स्थानमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े और स्तम्भ तथा ध्वजाओंसे सुसज्जित मण्डपका निर्माण करना चाहिये॥ ९॥ |
| गौरमृद्गोमयाभ्याञ्च लेपनं कारयेत्ततः।<br>तन्मध्ये वेदिका शुभ्रा कर्तव्या च समा स्थिरा॥ १० | उसको सफेद मिट्टी और गोबरसे लिपवा दे। तत्पश्चात् उस मण्डपके बीचमें सुन्दर, चौरस और स्थिर वेदी बनाये॥ १०॥ |
| चतुर्हस्ता च हस्तोच्छा पीठार्थं स्थानमुत्तमम्।<br>तोरणानि विचित्राणि वितानञ्च प्रकल्पयेत्॥ ११ | वह वेदी चार हाथ लम्बी-चौड़ी और हाथभर ऊँची होनी चाहिये। पीठके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करे तथा विविध रंगोंके तोरण लटकाये और ऊपर चाँदनी लगा दे॥ ११॥ |
| रात्रौ द्विजानथामन्त्र्य देवीतत्त्वविशारदान्।<br>आचारनिरतान्दान्तान्वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ १२<br><br>प्रतिपद्दिवसे कार्यं प्रातःस्नानं विधानतः।<br>नद्यां नदे तडागे वा वाप्यां कूपे गृहेऽथवा॥ १३ | रात्रिमें देवीका तत्त्व जाननेवाले, सदाचारी, संयमी और वेद-वेदांगके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल नदी, नद, तड़ाग, बावली, कुआँ अथवा घरपर ही विधिवत् स्नान करे॥ १२-१३॥ |
| प्रातर्नित्यं पुरः कृत्वा द्विजानां वरणं ततः।<br>अर्घ्यपाद्यादिकं सर्वं कर्तव्यं मधुपूर्वकम्॥ १४ | प्रातःकालके समय नित्यकर्म करके ब्राह्मणोंका वरण-कर उन्हें मधुपर्क तथा अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पण करे॥ १४॥ |
| वस्त्रालङ्करणादीनि देयानि च स्वशक्तितः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं विभवे सति कर्हिचित्॥ १५ | अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें वस्त्र, अलंकार आदि प्रदान करे। धन रहते हुए इस काममें कभी कृपणता न करे॥ १५॥ |
| विप्रैः सन्तोषिताैः कार्यं सम्पूर्णं सर्वथा भवेत्।<br>नव पञ्च त्रयश्चैको देव्याः पाठे द्विजाः स्मृताः॥ १६ | सन्तुष्ट ब्राह्मणोंके द्वारा किया हुआ कर्म सम्यक् प्रकारसे परिपूर्ण होता है। देवीका पाठ करनेके लिये नौ, पाँच, तीन अथवा एक ब्राह्मण बताये गये हैं॥ १६॥ |