भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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३८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं गच्छति काले वै सुशीलो नामतो गुणैः।<br>दारिद्र्यार्तो द्विजं शान्तं पप्रच्छातिबुभुक्षितः॥ ३५इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गुणोंके कारण सुशील नामसे ख्यातिप्राप्त उस वणिक्ने दरिद्रता तथा क्षुधा-पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल होकर एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणसे पूछा॥ ३५॥
सुशील उवाच<br>भो भूदेव कृपां कृत्वा वदस्वाद्य महामते।<br>कथं दारिद्र्यनाशः स्यादिति मे निश्चयेन वै॥ ३६**सुशील बोला—**हे महाबुद्धिसम्पन्न ब्राह्मण-देवता! आज मुझपर कृपा करके यह बताइये कि मेरी दरिद्रताका नाश निश्चितरूपसे कैसे हो सकता है?॥ ३६॥
धनैषणा मे नैवास्ति धनी स्यामिति मानद।<br>कुटुम्बभरणार्थं वै पृच्छामि त्वां द्विजोत्तम॥ ३७हे मानद! मुझे धनकी अभिलाषा तो नहीं है; किंतु हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे कोई ऐसा उपाय पूछ रहा हूँ, जिससे मैं कुटुम्बके भरण-पोषणमात्रके लिये धनसम्पन्न हो जाऊँ॥ ३७॥
पुत्री सुतस्तु मे बालो भक्षार्थी रोदते भृशम्।<br>तावन्मात्रं गृहे नान्नं मुष्टिमेकां ददाम्यहम्॥ ३८मेरी पुत्री और पुत्र [क्षुधासे पीड़ित होकर] भोजनके लिये बहुत रोते हैं और मेरे घरमें इतना भी अन्न नहीं रहता कि मैं उन्हें एक मुट्ठीभर अन्न दे सकूँ॥ ३८॥
विसर्जितो यतो गेहाद् गतो बालो रुदन्मया।<br>अतो मे दह्यतेऽत्यर्थं किं करोमि धनं विना॥ ३९रोते हुए बालकको मैंने घरसे निकाल दिया और वह चला गया। इसलिये मेरा हृदय शोकाग्निमें जल रहा है। धनके अभावमें मैं क्या करूँ?॥ ३९॥
विवाहोऽस्ति सुताया मे नास्ति वित्तं करोमि किम्।<br>दशवर्षाधिकायास्तु दानकालोऽपि यात्यलम्॥ ४०मेरी पुत्री विवाहके योग्य हो चुकी है, किंतु मेरे पास धन नहीं है। अब मैं क्या करूँ? वह दस वर्षसे अधिककी हो गयी है; इस प्रकार कन्यादानका समय बीता जा रहा है॥ ४०॥
तेन शोचामि विप्रेन्द्र सर्वज्ञोऽसि दयानिधे।<br>तपो दानं व्रतं किञ्चिद् ब्रूहि मन्त्रं जपं तथा॥ ४१<br><br>येनाहं पोष्यवर्गस्य करोमि द्विज पोषणम्।<br>तावन्मे स्याद्धनप्राप्तिर्नाधिकं प्रार्थये किल॥ ४२हे विप्रेन्द्र! इसीलिये मैं अत्यधिक चिन्तित हूँ। हे दयानिधान! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव मुझे कोई ऐसा तप, दान, व्रत, मन्त्र तथा जप बताइये, जिससे मैं अपने आश्रितजनोंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हो जाऊँ। हे द्विज! बस मुझे उतना ही धन मिल जाय और मैं उससे अधिक धनके लिये प्रार्थना नहीं करता॥ ४१-४२॥
त्वत्प्रसादात्कुटुम्बं मे सुखितं प्रभवेदिह।<br>तत्कुरुष्व महाभाग ज्ञानेन परिचिन्त्य च॥ ४३हे महाभाग! आपकी कृपासे मेरा परिवार अवश्य सुखी हो सकता है। अतएव आप अपने ज्ञानबलसे भलीभाँति विचार करके वह उपाय बताइये॥ ४३॥