देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० २९ ] | तृतीय स्कन्ध | ३९५ | | :--- | :--- |
| न वित्तं न बलं वीर त्वमेकः सहचारकः।<br>कोपं कस्मिन्करोम्यद्य भोगेऽस्मिन्स्वकृतेऽनुज॥ २८ | उपाय नहीं सूझता। हे वीर! मेरे पास न धन है, न बल; एकमात्र तुम ही मेरा साथ देनेवाले हो। हे अनुज! अपने ही द्वारा किये इस कर्मभोगके विषयमें अब मैं किसपर क्रोध करूँ?॥ २७-२८॥ | | गतं हस्तगतं राज्यं क्षणादिन्द्रसमोपमम्।<br>वने वासस्तु सम्प्राप्तः को वेद विधिनिर्मितम्॥ २९ | इन्द्र और यमके राज्यकी तरह हाथमें आया हुआ राज्य क्षणभरमें चला गया और वनवास प्राप्त हुआ; विधिकी रचनाको कौन जान सकता है?॥ २९॥ | | बालभावाच्च वैदेही चलिता चावयोः सह।<br>नीता दैवेन दुष्टेन श्यामा दुःखतरां दशाम्॥ ३० | बाल-स्वभावके कारण सीता भी हम दोनोंके साथ चली आयी। दुष्ट दैवने उस सुन्दरीको अत्यधिक दुःखपूर्ण स्थितिमें पहुँचा दिया॥ ३०॥ | | लङ्केशस्य गृहे श्यामा कथं दुःखे भविष्यति।<br>पतिव्रता सुशीला च मयि प्रीतियुता भृशम्॥ ३१ | वह सुन्दरी जानकी लंकापति रावणके घरमें किस प्रकार दुःखित जीवन व्यतीत करती होगी? वह पतिव्रता है, शीलवती है और मुझसे अत्यधिक अनुराग रखती है॥ ३१॥ | | न च लक्ष्मण वैदेही सा तस्य वशगा भवेत्।<br>स्वैरिणीव वरारोहा कथं स्याज्जनकात्मजा॥ ३२ | हे लक्ष्मण! वह जनकनन्दिनी उस रावणके वशमें कभी नहीं हो सकती, सुन्दर शरीरवाली वह विदेहतनया सीता स्वैरिणीकी भाँति भला किस प्रकार आचरण करेगी?॥ ३२॥ | | त्यजेत्प्राणान्नियंतृत्वे मैथिली भरतानुज।<br>न रावणस्य वशगा भवेदिति सुनिश्चितम्॥ ३३ | हे भरतानुज! वह मैथिली अधिक नियन्त्रण किये जानेपर अपने प्राण त्याग देगी, किंतु यह सुनिश्चित है कि वह रावणकी वशवर्तिनी नहीं होगी॥ ३३॥ | | मृता चेज्जानकी वीर प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्।<br>मृता चेदसितापाङ्गी किं मे देहेन लक्ष्मण॥ ३४ | हे वीर! यदि जानकी मर गयी तो मैं भी निस्सन्देह अपने प्राण त्याग दूँगा; क्योंकि हे लक्ष्मण! श्यामनयना सीताके मृत हो जानेपर मुझे अपने देहसे क्या लाभ?॥ ३४॥ | | एवं विलपमानं तं रामं कमललोचनम्।<br>लक्ष्मणः प्राह धर्मात्मा सान्त्वयन्नृतया गिरा॥ ३५ | इस प्रकार विलाप करते हुए उन कमलनयन रामको सत्यपूर्ण वाणीसे सान्त्वना प्रदान करते हुए धर्मात्मा लक्ष्मणने कहा—॥ ३५॥ | | धैर्यं कुरु महाबाहो त्यक्त्वा कातरतामिह।<br>आनयिष्यामि वैदेहीं हत्वा तं राक्षसाधमम्॥ ३६ | हे महाबाहो! आप इस समय दैन्यभाव छोड़कर धैर्य धारण कीजिये। मैं उस अधम राक्षसको मारकर जानकीको वापस ले आऊँगा॥ ३६॥ | | आपदि सम्पदि तुल्या धैर्याद्भवन्ति ते धीराः।<br>अल्पधियस्तु निमग्नाः कष्टे भवन्ति विभवेऽपि॥ ३७ | विपत्ति तथा सम्पत्ति—इन दोनों ही स्थितियोंमें धैर्य धारण करते हुए जो एक समान रहते हैं, वे ही धीर होते हैं, किंतु अल्प बुद्धिवाले लोग तो सम्पत्तिकी दशामें भी कष्टमें पड़े रहते हैं॥ ३७॥ | | संयोगो विप्रयोगश्च दैवाधीनावुभावपि।<br>शोकस्तु कीदृशस्तत्र देहेऽनात्मनि च क्वचित्॥ ३८ | संयोग तथा वियोग—ये दोनों ही दैवके अधीन होते हैं। शरीर तो आत्मासे भिन्न है, अतः उसके लिये शोक कैसा?॥ ३८॥ |