भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

३१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० ---|--- उपविष्टं तदा रामं सानुजं दुःखमानसम्।<br>पप्रच्छ नारदः प्रीत्या कुशलं मुनिसत्तमः॥ ५ | तब अपने अनुज लक्ष्मणके साथ बैठे हुए खिन्न-मनस्क रामसे मुनीन्द्र नारदजी प्रेमपूर्वक कुशलक्षेम पूछने लगे॥ ५॥ कथं राघव शोकार्तो यथा वै प्राकृतो नरः।<br>हृतां सीतां च जानामि रावणेन दुरात्मना॥ ६<br><br>सुरसद्मगतश्चाहं श्रुत्वाञ्जनकात्मजाम्।<br>पौलस्त्येन हृतां मोहान्मरणं स्वमजानता॥ ७ | नारदजी बोले—हे राघव! आप इस समय साधारण मनुष्यके समान शोकाकुल क्यों हैं? मैं यह जानता हूँ कि दुष्ट रावण सीताको हर ले गया है। जब मैं देवलोकमें गया था, तभी मैंने वहाँ सुना कि अपनी मृत्युको न जाननेसे ही मोहके वशीभूत होकर रावणने जनकनन्दिनीका हरण कर लिया है॥ ६-७॥ तव जन्म च काकुत्स्थ पौलस्त्यनिधनाय वै।<br>मैथिलीहरणं जातमेतदर्थं नराधिप॥ ८ | हे काकुत्स्थ! आपका जन्म ही रावणके निधनके लिये हुआ है। हे नराधिप! इसी कार्यसिद्धिके लिये सीताका हरण हुआ है॥ ८॥ पूर्वजन्मनि वैदेही मुनिपुत्री तपस्विनी।<br>रावणेन वने दृष्टा तपस्यन्ती शुचिस्मिता॥ ९<br><br>प्रार्थिता रावणेनासौ भव भार्येति राघव।<br>तिरस्कृतस्तयासौ वै जग्राह कबरं बलात्॥ १० | पूर्वजन्ममें ये वैदेही एक मुनिकी तपस्विनी कन्या थीं। उस पवित्र मुसकानवाली कन्याको रावणने वनमें तप करते हुए देखा। हे राघव! तब रावणने उससे प्रार्थना की कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ। इसपर उसके द्वारा तिरस्कृत किये गये रावणने बलपूर्वक उसके केश पकड़ लिये॥ ९-१०॥ शशाप तत्क्षणं राम रावणं तापसी भृशम्।<br>कुपिता त्यक्तुमिच्छन्ती देहं संस्पर्शदूषितम्॥ ११<br><br>दुरात्मंस्तव नाशार्थं भविष्यामि धरातले।<br>अयोनिजा वरा नारी त्यक्त्वा देहं जहावपि॥ १२ | हे राम! रावणके स्पर्शसे दूषित अपनी देहको त्यागनेकी आकांक्षा रखती हुई उस तापसी मुनिकन्याने अत्यन्त कुपित होकर उसे तत्काल यह घोर शाप दे दिया कि हे दुरात्मन्! तुम्हारे विनाशके लिये मैं भूतलपर गर्भसे जन्म न लेकर एक श्रेष्ठ स्त्रीके रूपमें प्रकट होऊँगी—ऐसा कहकर उस तापसीने अपना शरीर त्याग दिया॥ ११-१२॥ सेयं रंमांशसम्भूता गृहीता तेन रक्षसा।<br>विनाशार्थं कुलस्यैव व्याली स्रगिव सम्भ्रमात्॥ १३ | लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न यह सीता वही है; जिसे भ्रमवश माला समझकर नागिनको धारण करनेवाले व्यक्तिकी भाँति रावणने अपने ही वंशका नाश करनेके लिये हर लिया है॥ १३॥ तव जन्म च काकुत्स्थ तस्य नाशाय चामरैः।<br>प्रार्थितस्य हरेरंशादजवंशेऽप्यजन्मनः॥ १४ | हे काकुत्स्थ! आपका भी जन्म उसी रावणके नाशके लिये देवताओंके प्रार्थना करनेपर अनादि भगवान् विष्णुके अंशसे अजवंशमें हुआ है॥ १४॥ कुरु धैर्यं महाबाहो तत्र सा वर्ततेऽवशा।<br>सतीधर्मरता सीता त्वां ध्यायन्ती दिवानिशम्॥ १५ | हे महाबाहो! आप धैर्य धारण करें; वे किसी दूसरेके वशमें नहीं हो सकतीं! वे सतीधर्मपरायण सीता लंकामें दिन-रात आपका ध्यान करती हुई रह रही हैं॥ १५॥