देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 409, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| कारणं सर्वजन्तूनां ब्रह्मादीनां रघूद्वह।<br>तस्याः शक्तिं विना कोऽपि स्पन्दितुं न क्षमो भवेत्॥ २९ | हे रघुनन्दन! वे ब्रह्मा आदि देवताओं तथा समस्त जीवोंकी कारणस्वरूपा हैं। उनसे शक्ति पाये बिना कोई हिल-डुल सकनेमें भी समर्थ नहीं है॥ २९॥ | | विष्णोः पालनशक्तिः सा कर्तृशक्तिः पितुर्मम।<br>रुद्रस्य नाशशक्तिः सा त्वन्या शक्तिः परा शिवा॥ ३० | वे ही मेरे पिता ब्रह्माकी सृष्टि-शक्ति हैं, विष्णुकी पालन-शक्ति हैं तथा शंकरकी संहार-शक्ति हैं। वे कल्याणमयी पराम्बा अन्य शक्तिरूपा भी हैं॥ ३०॥ | | यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्भुवनत्रये।<br>तस्य सर्वस्य या शक्तिस्तदुत्पत्तिः कुतो भवेत्॥ ३१ | इन तीनों लोकोंमें जो कुछ भी कहीं भी सत् या असत् पदार्थ है, उसकी उत्पत्तिमें निमित्तकारण इस देवीके अतिरिक्त और कौन हो सकता है?॥ ३१॥ | | न ब्रह्मा न यदा विष्णुर्न रुद्रो न दिवाकरः।<br>न चेन्द्राद्याः सुराः सर्वे न धरा न धराधराः॥ ३२<br>तदा सा प्रकृतिः पूर्णा पुरुषेण परेण वै।<br>संयुता विहरत्येव युगादौ निर्गुणा शिवा॥ ३३ | इस सृष्टिके आरम्भमें जब ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्रादि देवता, पृथ्वी और पर्वत आदि कुछ भी नहीं रहता, तब उस समय वे निर्गुणा, कल्याणमयी, परा प्रकृति ही परमपुरुषके साथ विहार करती हैं॥ ३२-३३॥ | | सा भूत्वा सगुणा पश्चात्करोति भुवनत्रयम्।<br>पूर्वं संसृज्य ब्रह्मादीन्दत्त्वा शक्तींश्च सर्वशः॥ ३४ | वे ही बादमें सगुणा शक्ति बनकर सर्वप्रथम ब्रह्मा आदिका सृजन करके और उन्हें शक्तियाँ प्रदानकर तीनों भुवनोंकी सम्यक् रचना करती हैं॥ ३४॥ | | तां ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।<br>सा विद्या परमा ज्ञेया वेदाद्या वेदकारिणी॥ ३५ | उन आदिशक्तिको जानकर प्राणी संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। विद्यास्वरूपा, वेदोंकी आदिकारण, वेदोंको प्रकट करनेवाली तथा परमा उन भगवतीको अवश्य जानना चाहिये॥ ३५॥ | | असंख्यातानि नामानि तस्या ब्रह्मादिभिः किल।<br>गुणकर्मविधानैस्तु कल्पितानि च किं ब्रुवे॥ ३६<br>अकारादिक्षकारान्तैः स्वरैर्वर्णैस्तु योजितैः।<br>असंख्येयानि नामानि भवन्ति रघुनन्दन॥ ३७ | ब्रह्मादि देवताओंने गुण-कर्मके विधानानुसार उनके असंख्य नाम कल्पित किये हैं, मैं कहाँतक बताऊँ? हे रघुनन्दन! ‘अ’ कारसे लेकर ‘क्ष’ पर्यन्त सभी स्वरों तथा वर्णोंके संयोगसे उनके असंख्य नाम बनते हैं॥ ३६-३७॥ | | श्रीराम उवाच<br>विधिं मे ब्रूहि विप्रर्षे व्रतस्यास्य समासतः।<br>करोम्यद्यैव श्रद्धावाञ्छ्रीदेव्याः पूजनं तथा॥ ३८ | श्रीराम बोले— हे देवर्षे! इस नवरात्रव्रतका विधान मुझे संक्षेपमें बताइये; मैं आज ही श्रद्धापूर्वक श्रीदेवीका विधिवत् पूजन करूँगा॥ ३८॥ | | नारद उवाच<br>पीठं कृत्वा समे स्थाने संस्थाप्य जगदम्बिकाम्।<br>उपवासान्नवैव त्वं कुरु राम विधानतः॥ ३९<br>आचार्योऽहं भविष्यामि कर्मण्यस्मिन्महीपते।<br>देवकार्यविधानार्थमुत्साहं प्रकरोम्यहम्॥ ४० | नारदजी बोले— हे राम! किसी समतल भूमिपर पीठासन बनाकर उसपर भगवती जगदम्बिकाकी स्थापना करके विधानपूर्वक नौ दिन उपवास कीजिये। हे राजन्! इस कार्यमें मैं आचार्य बनूँगा; क्योंकि देवताओंके कार्य करनेमें मैं अधिक उत्साह रखता हूँ॥ ३९-४०॥ |