देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 42, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 42
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्
अथ प्रथमोऽध्यायः
सूतजीके द्वारा ऋषियोंके प्रति श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणकी महिमाका कथन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सृष्टौ या सर्गरूपा जगदवनविधौ<br> पालनी या च रौद्री<br>संहारे चापि यस्या जगदिदमखिलं<br> क्रीडनं या पराख्या।<br>पश्यन्ती मध्यमाथो तदनु भगवती<br> वैखरी वर्णरूपा<br>सास्मद्वाचं प्रसन्ना विधिहरिगिरिशा-<br> राधितालङ्करोतु ॥ १॥ | जगत्के सृष्टिकार्यमें जो उत्पत्तिरूपा, रक्षाकार्यमें पालनशक्तिरूपा, संहारकार्यमें रौद्ररूपा हैं, सम्पूर्ण विश्व-प्रपंच जिनके लिये क्रीडास्वरूप है, जो परा-पश्यन्ती-मध्यमा तथा वैखरी वाणीमें अभिव्यक्त होती हैं और जो ब्रह्मा-विष्णु-महेशद्वारा निरन्तर आराधित हैं, वे प्रसन्न चित्तवाली देवी भगवती मेरी वाणीको अलंकृत (परिशुद्ध) करें॥ १॥ |
| नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ २ | [बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि] श्रीनारायण तथा नरोंमें श्रेष्ठ श्रीनर, भगवती सरस्वती और महर्षि वेदव्यासको प्रणाम करनेके पश्चात् ही जय (इतिहासपुराणादि सद्ग्रन्थों)-का पाठ-प्रवचन करना चाहिये॥ २॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>सूत जीव समा बह्वीर्यस्त्वं श्रावयसीह नः।<br>कथा मनोहराः पुण्या व्यासशिष्य महामते॥ ३ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! हे महामते! हे व्यासशिष्य! आप दीर्घजीवी हों; आप हमलोगोंको नानाविध पुण्यप्रदायिनी एवं मनोहारिणी कथाएँ सुनाते रहते हैं॥ ३॥ |
| सर्वपापहरं पुण्यं विष्णोश्चरितमद्भुतम्।<br>अवतारकथोपेतमस्माभिर्भक्तितः श्रुतम्॥ ४ | भगवान् विष्णुके सर्वपापविनाशक, परम पवित्र एवं उन अवतार-कथाओंसे सम्बन्धित अद्भुत चरित्रोंको हमने भक्तिपूर्वक सुना और इसी प्रकार हमने भगवान् शिवके अलौकिक चरित्र तथा भस्म और रुद्राक्षके ऐतिहासिक माहात्म्यका श्रवण आपके मुखारविन्दसे किया॥ ४-५॥ |
| शिवस्य चरितं दिव्यं भस्मरुद्राक्षयोस्तथा।<br>सेतिहासञ्च माहात्म्यं श्रुतं तव मुखाम्बुजात्॥ ५ | |
| अधुना श्रोतुमिच्छामः पावनात् पावनं परम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणामनायासेन सर्वशः॥ ६ | हमलोग अब ऐसी परम पावन कथा सुनना चाहते हैं, जो बिना प्रयासके ही मनुष्योंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेमें पूर्णरूपसे सहायक हो॥ ६॥ |
| तत् त्वं ब्रूहि महाभाग येन सिध्यन्ति मानवाः।<br>कलावपि परं त्वत्तो न विद्मः संशयच्छिदम्॥ ७ | हे महाभाग! अतः आप उस कथाका वर्णन करें, जिसके द्वारा मानव कलियुगमें भी सिद्धियाँ प्राप्त कर लें; क्योंकि हम आपसे बढ़कर किसी अन्यको नहीं जानते हैं, जो हमारी शंकाओंका निवारण कर सके॥ ७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 A