देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० ७ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| संग्रामस्तु कथं ताभ्यां कृतस्तेन महात्मना।<br>प्रह्लादोऽप्यतिधर्मात्मा ज्ञानवान्विष्णुतत्परः॥ २० | प्रह्लाद भी अत्यन्त धर्मपरायण, ज्ञानसम्पन्न तथा विष्णुभक्त थे, तब महात्मा प्रह्लादने उन ऋषियोंके साथ युद्ध क्यों किया ?॥ २०॥ |
| नरनारायणौ तद्वत्तापसौ सत्त्वसंस्थितौ।<br>तेन ताभ्यां समुद्भूतं वैरं यदि परस्परम्॥ २१<br><br>तदा तपसि धर्मे च श्रम एव हि केवलम्।<br>क्व जपः क्व तपश्चर्या पुरा सत्ययुगेऽपि च॥ २२ | तपस्वी नर-नारायण भी प्रह्लादकी ही भाँति सात्त्विक भावसे सम्पन्न थे। उन दोनों ऋषियों तथा प्रह्लादमें यदि परस्पर वैर उत्पन्न हो गया तो फिर उनकी तपस्या तथा धर्माचरणके पालनमें केवल परिश्रम ही उनके हाथ लगा। उस सत्ययुगमें भी उनके जप तथा घोर तप कहाँ चले गये थे ?॥ २१-२२॥ |
| तादृशैनं जितं चित्तं क्रोधाहङ्कारसंवृतम्।<br>न क्रोधो न च मात्सर्यमहङ्कारांकुरं विना॥ २३<br><br>अहङ्कारात्समुत्पन्नाः कामक्रोधादयः किल।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु तपः कृत्वातिदारुणम्॥ २४<br><br>अहङ्कारांकुरे जाते व्यर्थं भवति सर्वथा।<br>यथा सूर्योदये जाते तमोरूपं न तिष्ठति॥ २५<br><br>अहङ्कारांकुरस्याग्रे तथा पुण्यं न तिष्ठति। | वैसे वे महात्मा भी क्रोध और अहंकारसे भरे अपने मनको वशमें नहीं कर सके। अहंकाररूपी बीजके अंकुरित हुए बिना क्रोध तथा मात्सर्य उत्पन्न नहीं होते हैं। यह निश्चित है कि काम-क्रोध आदि अहंकारसे ही उत्पन्न होते हैं। हजार करोड़ वर्षोंतक घोर तपस्या करनेके पश्चात् भी यदि अहंकारका अंकुरण हुआ तो फिर सब कुछ निरर्थक हो जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होनेपर अन्धकार नहीं ठहरता, उसी प्रकार अहंकाररूपी अंकुरके समक्ष पुण्य नहीं ठहर पाता है॥ २३-२५ ½॥ |
| प्रह्लादोऽपि महाभाग हरिणा समयुध्यत॥ २६<br><br>तदा व्यर्थं कृतं सर्वं सुकृतं किल भूतले। | हे महाभाग! प्रह्लादने भी भगवान् नर-नारायणके साथ संग्राम किया, जिसके कारण पृथ्वीपर उनके द्वारा अर्जित समस्त पुण्य व्यर्थ हो गया॥ २६ ½॥ |
| नरनारायणौ शान्तौ विहाय परमं तपः॥ २७<br><br>कृतवन्तौ यदा युद्धं क्व शमः सुकृतं पुनः। | शान्त स्वभाववाले नर-नारायण भी अपनी कठिन तपस्या त्यागकर यदि युद्ध करनेमें तत्पर हुए तो फिर उनकी शान्तिवृत्ति तथा पुण्यशीलताका क्या महत्त्व रहा ?॥ २७ ½॥ |
| ईदृग्भ्यां सत्त्वयुक्ताभ्यामजेया यद्यहङ्कृतिः॥ २८<br><br>मादृशानाञ्च का वार्ता मुनेऽहङ्कारसंक्षये।<br>अहङ्कारपरित्यक्तो न कोऽप्यस्ति जगत्त्रये॥ २९<br><br>न भूतो भविता नैव यस्त्यक्तस्तेन सर्वथा। | हे मुने! जब सात्त्विक भावोंसे सम्पन्न इस प्रकारके वे दोनों महात्मा भी अहंकारपर विजय प्राप्त करनेमें असमर्थ रहे, तब मेरे-जैसे व्यक्तियोंके लिये अहंकार नष्ट करनेकी बात ही क्या है? इस त्रिलोकमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो अहंकारसे मुक्त हो, इसी तरह ऐसा कोई भी न तो हुआ है और न होगा, जो अहंकारसे पूर्णतया मुक्त हो॥ २८-२९ ½॥ |
| मुच्यते लोहनिगडैर्बद्धः काष्ठमयैस्तथा॥ ३०<br><br>अहङ्कारनिबद्धस्तु न कदाचिद्विमुच्यते।<br>अहङ्कारावृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३१ | काष्ठ तथा लोहेकी जंजीरमें बँधा हुआ व्यक्ति बन्धनमुक्त हो सकता है, किंतु अहंकारसे बँधा व्यक्ति कभी भी नहीं छूट सकता। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् अहंकारसे व्याप्त है॥ ३०-३१॥ |