भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 450
अ० ९ ]चतुर्थ स्कन्ध४४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ध्यानस्थौ तौ महाभागौ नरनारायणावृषी।<br>दृष्ट्वा धर्मसुतौ तत्र दैत्यानामधिपस्तदा॥ ६<br><br>क्रोधरक्तेक्षणस्तौ तु प्रोवाचासुरपालकः।<br>किं भवद्भ्यां समारब्धो दम्भो धर्मविनाशनः॥ ७उन महाभाग धर्मपुत्र नर-नारायण ऋषियोंको उस समय ध्यानावस्थित देखकर क्रोधसे लाल आँखें किये हुए दैत्याधिपति असुररक्षक प्रह्लादने उनसे कहा—आप दोनोंने धर्मको नष्ट करनेवाला यह कैसा पाखण्ड कर रखा है?॥ ६-७॥
न श्रुतं नैव दृष्टं हि संसारेऽस्मिन्कदापि हि।<br>तपसश्चरणं तीव्रं तथा चापस्य धारणम्॥ ८इस प्रकारकी घोर तपस्या तथा धनुष-धारण करना—ऐसा तो इस संसारमें न कभी सुना गया और न देखा ही गया॥ ८॥
विरोधोऽयं युगे चाद्ये कथं युक्तं कलिप्रियम्।<br>ब्राह्मणस्य तपो युक्तं तत्र किं चापधारणम्॥ ९ये तो परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं। कलियुगके लिये प्रिय यह विरोधभाव भला सत्ययुगमें किस प्रकार उचित है? ब्राह्मणके लिये तो तपश्चरण ही उचित है, उन्हें धनुष-धारण करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ९॥
क्व जटाधारणं देहे क्वेषुधी च विडम्बनौ।<br>धर्मस्याचरणं युक्तं युवयोर्दिव्यभावयोः॥ १०कहाँ तो मस्तकपर जटा धारण करना और कहाँ यह तरकस रखना—ये दोनों बातें आडम्बरमात्र हैं। दिव्य भावनावाले आप दोनोंके लिये धर्मका आचरण ही उचित है॥ १०॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा नरः प्रोवाच भारत।<br>का ते चिन्तात्र दैत्येन्द्र वृथा तपसि चावयोः॥ ११**व्यासजी बोले—**हे भारत! प्रह्लादका यह वचन सुनकर मुनिवर नरने कहा—हे दैत्येन्द्र! हम दोनोंकी तपस्याके विषयमें आप यह व्यर्थ चिन्ता क्यों कर रहे हैं?॥ ११॥
सामर्थ्ये सति यत्कुर्यात्तत्संपद्येत तस्य हि।<br>आवां कार्यद्वये मन्द समर्थौ लोकविश्रुतौ॥ १२सामर्थ्यसम्पन्न हो जानेपर व्यक्ति जो कुछ करता है, उसका वह सब कुछ पूर्ण हो जाता है। हे मन्दबुद्धि! हम इन दोनों प्रकारके कार्योंको [एक साथ] करनेमें समर्थ हैं; इसके लिये हम लोकमें प्रसिद्ध हैं॥ १२॥
युद्धे तपसि सामर्थ्यं त्वं पुनः किं करिष्यसि।<br>गच्छ मार्गे यथाकामं कस्मादत्र विकत्थसे॥ १३युद्ध तथा तपस्या दोनोंमें हम समान रूपसे समर्थ हैं। फिर इस विषयमें आप पूछकर क्या करेंगे? आप इच्छानुसार अपने रास्ते चले जाइये, यहाँ व्यर्थकी बात क्यों कर रहे हैं?॥ १३॥
ब्रह्मतेजो दुराराध्यं न त्वं वेद विमोहितः।<br>विप्रचर्चा न कर्तव्या प्राणिभिः सुखमीप्सुभिः॥ १४मोहग्रस्त होनेके कारण आप अत्यन्त कठिनतासे प्राप्त किये जानेवाले ब्रह्मतेजको नहीं जानते। सुखकी कामना करनेवाले प्राणियोंको ब्राह्मणोंसे बहस नहीं करनी चाहिये॥ १४॥
प्रह्लाद उवाच<br>तापसौ मन्दबुद्धी स्थो मृषा वां गर्वमोहितौ।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ १५**प्रह्लाद बोले—**आप दोनों तपस्वी मन्द बुद्धिवाले हैं और व्यर्थ ही अहंकारके वशवर्ती हो गये हैं। धर्मसेतुका प्रवर्तन करनेवाले मुझ दैत्येन्द्र प्रह्लादके रहते