भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 889 में से

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पृष्ठ 460

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१


सेवाथ समये कार्या शत्रूणां शुभकाम्यया ।<br>स्वशक्त्युपचये काले हन्तव्यास्ते मनीषिभिः ॥ ११बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अपने कल्याणकी इच्छासे समयपर शत्रुओंकी भी सेवा करे और अपनी शक्तिका संचय हो जानेपर उन्हें मार डाले ॥ ११ ॥
तदद्य विनयं कृत्वा सामपूर्वं छलेन वै।<br>तिष्ठध्वं स्वनिकेतेषु मदागमनकाङ्क्षया ॥ १२अतः देवताओंकी विनती करके छलपूर्वक सामनीतिका प्रयोग करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षाके साथ अपने-अपने घरोंमें रहो ॥ १२ ॥
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि दानवाः ।<br>युध्यामहे पुनर्दैवान्मन्त्रमास्थाय वै बलम् ॥ १३हे दानवो! महादेवजीसे मन्त्र प्राप्त करके मैं आऊँगा और तब उसी मन्त्रबलका आश्रय लेकर हमलोग देवताओंसे युद्ध करेंगे ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वाथ भृगुस्तेभ्यो जगाम कृतनिश्चयः ।<br>महादेवं महाराज मन्त्रार्थं मुनिसत्तमः ॥ १४हे महाराज! उन दानवोंसे ऐसा कहकर दृढ़ संकल्पवाले मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य मन्त्रप्राप्तिके लिये शिवजीके पास चले गये ॥ १४ ॥
दानवाः प्रेषयामासुः प्रह्लादं सुरसन्निधौ ।<br>सत्यवादिनमव्यग्रं सुराणां प्रत्ययप्रदम् ॥ १५तदनन्तर दैत्योंने सत्यवादी, धैर्यवान् तथा देवताओंके विश्वासपात्र प्रह्लादको देवताओंके पास भेजा ॥ १५ ॥
प्रह्लादस्तु सुरान्प्राह प्रश्रयावनतो नृपः ।<br>असुरैः सहितस्तत्र वचनं नम्रतायुतम् ॥ १६<br><br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसन्नाहास्तथैव च ।<br>देवास्तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्युताः ॥ १७असुरोंके साथ वहाँ जाकर राजा प्रह्लाद विनय-सम्पन्न होकर देवताओंसे नम्रतायुक्त वचन बोले। हे देवताओ! हम सभी लोगोंने शस्त्र रख दिये हैं और कवचका त्याग कर दिया है। अब हम वल्कल धारण करके तपस्या करेंगे ॥ १६-१७ ॥
प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत् ।<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते ॥ १८प्रह्लादका वचन सुनकर देवताओंने उसे सत्य मान लिया और इसके बाद वे निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे लौट गये ॥ १८ ॥
न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ।<br>विश्रब्धाः स्वगृहान्गत्वा क्रीडासक्ताः सुसंस्थिताः ॥ १९तब दैत्योंके शस्त्र त्याग देनेपर देवता युद्धसे विरत हो गये और चिन्तारहित होकर अपने-अपने घर जाकर स्वस्थचित्त हो क्रीड़ाविलासमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥
दैत्या दम्भं समालम्ब्य तापसास्तपिसंयुताः ।<br>कश्यपस्याश्रमे वासं चक्रुः काव्यागमेच्छया ॥ २०उस समय दैत्यगण पाखण्डका सहारा लेकर तपस्वीके रूपमें तपस्यारत होकर शुक्राचार्यके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए कश्यपमुनिके आश्रममें रहने लगे ॥ २० ॥
काव्यो गत्वाथ कैलासं महादेवं प्रणम्य च।<br>उवाच विभुना पृष्टः किं ते कार्यमिति प्रभुः ॥ २१<br><br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ ।<br>पराजयाय देवानामसुरणां जयाय च ॥ २२उधर, मुनि शुक्राचार्यने कैलासपर्वतपर पहुँचकर शंकरजीको प्रणाम किया। भगवान् शिवके पूछनेपर कि 'आपका क्या कार्य है?'—उन्होंने कहा—हे देव! मैं देवताओंकी पराजय और असुरोंकी विजयके लिये उन मन्त्रोंको चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके भी पास न हों ॥ २१-२२ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 C

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