देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २
| तदारभ्य परं जाने देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुनापि हि देवर्षे श्रुतं तव मुखाम्बुजात्॥ ६५ | तभीसे मैं देवीके अत्युत्तम माहात्म्यको जान रहा हूँ और हे देवर्षे ! आज भी आपके मुखारविन्दसे मैंने वही देवीमाहात्म्य सुना है॥ ६५॥ |
| अतो भागवतं देव्यास्त्वमेव श्रावय प्रभो।<br>मद्भाग्यादेव देवर्षे सम्प्राप्तोऽसि दयानिधे॥ ६६ | अतः हे प्रभो ! अब आप ही मुझे श्रीमद्देवीभागवत सुनाइये। हे दयानिधान ! मेरे सौभाग्यसे ही आप यहाँ पधारे हुए हैं॥ ६६॥ |
| वसुदेववचः श्रुत्वा नारदः प्रीतमानसः।<br>सुदिने शुभनक्षत्रे कथारम्भमथाकरोत्॥ ६७ | वसुदेवजीका वचन सुनकर प्रसन्न मनवाले नारदजीने शुभ दिन एवं शुभ नक्षत्रमें श्रीमद्देवीभागवतकी कथा आरम्भ की॥ ६७॥ |
| कथाविघ्नविघातार्थं द्विजा जेपुर्नवाक्षरम्।<br>मार्कण्डेयपुराणोक्तं पेठुर्देव्याः स्तवं तथा॥ ६८ | कथामें आनेवाली विघ्न-बाधाओंके शमनार्थ ब्राह्मण देवीके नवाक्षर (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे)-मन्त्रका जप तथा मार्कण्डेयपुराणमें वर्णित देवीस्तोत्रका पाठ करने लगे॥ ६८॥ |
| प्रथमस्कन्धमारभ्य श्रीनारदमुखोद्गतम्।<br>शुश्राव वसुदेवश्च भक्त्या भागवतामृतम्॥ ६९ | प्रथम स्कन्धके आरम्भसे ही वसुदेवजी देवर्षि नारदके मुखसे निःसृत अमृतरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका भक्तिपूर्वक श्रवण करने लगे॥ ६९॥ |
| नवमेऽह्नि कथापूर्तौ पुस्तकं वाचकं तथा।<br>प्रसन्नः पूजयामास वसुदेवो महामनाः॥ ७० | नौवें दिन कथाकी समाप्ति होनेपर महामनस्वी वसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थ तथा कथावाचक दोनोंकी प्रसन्नतापूर्वक पूजा की॥ ७०॥ |
| अथ तत्र बिलस्यान्तः कृष्णाजाम्बवतोर्मृधे।<br>कृष्णमुष्टिविनिष्पातश्लथाङ्गो जाम्बवानभूत्॥ ७१ | उधर कन्दरामें श्रीकृष्ण तथा जाम्बवान्के बीच चल रहे युद्धमें श्रीकृष्णके मुष्टिकाप्रहारोंसे जाम्बवान्का शरीर अत्यन्त शिथिल पड़ गया था॥ ७१॥ |
| अथागतस्मृतिः सोऽपि भगवन्तं प्रणम्य च।<br>उवाच परया भक्त्या स्वापराधं क्षमापयन्॥ ७२ | उसी समय जाम्बवान्को भी पूर्वकालकी घटनाएँ याद आ गयीं और भगवान् श्रीकृष्णको परम भक्तिके साथ प्रणाम करके अपने अपराधके लिये क्षमा-याचना करते हुए उसने श्रीकृष्णसे कहा—अब मुझे |
| ज्ञातोऽसि रघुवर्यस्त्वं यद्रोषात् सरितांपतिः।<br>क्षोभं जगाम लङ्का च रावणः सानुगो हतः॥ ७३ | ज्ञात हो गया कि आप रघुश्रेष्ठ श्रीराम ही हैं, जिनके भयंकर कोपसे सागर तथा लंकानगरी—दोनों क्षुब्ध हो गये थे और रावण अपने बन्धु-बान्धवोंसहित मारा गया था॥ ७२-७३॥ |
| स एवासि भवान् कृष्ण मद्दौरात्म्यं क्षमस्व भोः।<br>ब्रूहि यत् करणीयं मे भृत्योऽहं तव सर्वथा॥ ७४ | हे श्रीकृष्ण! वे राम आप ही हैं, अतः मेरी धृष्टताको क्षमा करें। मैं आपका सर्वथा सेवक हूँ, अतएव मेरेयोग्य जो भी कार्य हो, उसके लिये मुझे आदेश दीजिये॥ ७४॥ |
| श्रुत्वा जाम्बवतो वाचमब्रवीज्जगदीश्वरः।<br>मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम्॥ ७५ | जाम्बवान्का वचन सुनकर जगत्पति श्रीकृष्ण बोले—हे ऋक्षराज! मणि प्राप्त करनेके लिये हमलोग इस कन्दरामें आये हुए हैं॥ ७५॥ |