देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० २ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५३९ |
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| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं रम्भः पावकस्य सुभाषितम्।<br>ततोऽब्रवीद्वचो रम्भस्त्यक्त्वा केशकलापकम्॥ २७<br><br>यदि तुष्टोऽसि देवेश देहि मे वाञ्छितं वरम्।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मः परबलार्दनः॥ २८<br><br>अजेयः सर्वथा स स्याद्देवदानवमानवैः।<br>कामरूपी महावीर्यः सर्वलोकाभिवन्दितः॥ २९<br><br>पावकस्तं तथेत्याह भविष्यति तवेप्सितम्।<br>पुत्रस्तव महाभाग मरणाद्विरमाधुना॥ ३०<br><br>यस्यां चित्तं तु रम्भ त्वं प्रमदायां करिष्यसि।<br>तस्यां पुत्रो महाभाग भविष्यति बलाधिकः॥ ३१<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तो वह्निना रम्भो वचनं चित्तरञ्जनम्।<br>श्रुत्वा प्रणम्य प्रययौ वह्निं तं दानवोत्तमः॥ ३२<br><br>यक्षैः परिवृतं स्थानं रमणीयं श्रियान्वितम्।<br>दृष्ट्वा चक्रे तदा भावं महिष्यां दानवोत्तमः॥ ३३<br><br>मत्तायां रूपपूर्णायां विहायान्याञ्च योषितम्।<br>सा समागाच्च तरसा कामयन्ती मुदान्विता॥ ३४<br><br>रम्भोऽपि गमनं चक्रे भवितव्यप्रणोदितः।<br>सा तु गर्भवती जाता महिषी तस्य वीर्यतः॥ ३५<br><br>तां गृहीत्वाथ पातालं प्रविवेश मनोहरम्।<br>महिषेभ्यश्च तां रक्षन्प्रियामनुमतां किल॥ ३६<br><br>कदाचिन्महिषश्चान्यः कामार्तस्तामुपाद्रवत्।<br>स्वयमागत्य तं हन्तुं दानवः समुपाद्रवत्॥ ३७ | व्यासजी बोले— अग्निदेवका सुन्दर वचन सुनकर रम्भने अपना केशपाश छोड़कर कहा—हे देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वांछित वरदान दीजिये कि मुझे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाला तथा शत्रु-सेनाका विनाश करनेवाला पुत्र प्राप्त हो। वह देवता, दानव तथा मनुष्य—इन सभीसे सर्वथा अजेय हो। वह महापराक्रमी, अपने इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करनेमें समर्थ तथा सभी लोगोंके लिये वन्दनीय हो॥ २७—२९॥<br><br>अग्निदेवने उससे कहा कि जैसी तुम्हारी अभिलाषा है, वैसा ही होगा। हे महाभाग! तुम्हें वैसा ही पुत्र प्राप्त होगा, किंतु अब तुम मरनेका विचार छोड़ दो॥ ३०॥<br><br>हे महाभाग! हे रम्भ! जिस भी स्त्रीके प्रति तुम्हारे मनमें आसक्ति-भाव आ जायगा, उसीसे तुम्हें वह महाबलशाली पुत्र उत्पन्न होगा॥ ३१॥<br><br>व्यासजी बोले— हे राजन्! अग्निदेवने उससे ऐसा कहा। तब उनका मनमोहक वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ रम्भ अग्निको प्रणाम करके वहाँसे चला गया और एक ऐसे स्थानपर जा पहुँचा जो रमणीक, समृद्धियोंसे सम्पन्न तथा यक्षोंसे घिरा हुआ था॥ ३२ १/२ ॥<br><br>वहाँ एक रूपवती तथा मदमत्त महिषीको देखकर वह दानवश्रेष्ठ किसी अन्य स्त्रीको छोड़कर उसीपर आसक्त हो गया। वह महिषी भी उसे प्रसन्नतापूर्वक चाहती हुई तत्काल उसके साथ रमणके लिये तैयार हो गयी। होनहारसे प्रेरित होकर रम्भने उसके साथ समागम किया और उसके वीर्यसे वह महिषी गर्भवती हो गयी॥ ३३—३५॥<br><br>तत्पश्चात् उसे अपने साथ लेकर रम्भने मनोहर पाताललोकमें प्रवेश किया और वहाँपर महिषोंसे अपने मनोनुकूल उस प्रियतमाकी रक्षा करता हुआ वह सुखपूर्वक रहने लगा॥ ३६॥<br><br>किसी दिन एक दूसरे महिषने कामासक्त होकर उस महिषीको दौड़ा लिया। यह देखकर दानव रम्भ स्वयं वहाँ आकर उसे मारनेके लिये दौड़ा और उसके पास पहुँचकर |