देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुत्रोऽयं मम दोषेण मातुर्दोषेण वा मुने।<br>जातो दुःखাবহः पित्रोर्दुःशीलो बन्धुशोकदः॥ २३ | हे मुने! दुःखदायी, माता-पिताके प्रति उद्दण्ड तथा बन्धु-बान्धवोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह पुत्र मेरे दोषसे अथवा अपनी माताके दोषसे उत्पन्न हुआ ? ॥ २३ ॥ |
| एतन्निशम्य वचनं गर्गाचार्यो मुनेस्तदा।<br>विचार्य सर्वं तद्धेतुं ज्योतिर्विद्वाचमब्रवीत्॥ २४ | तब ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता गर्गाचार्यने मुनि ऋतवाक्का यह वचन सुनकर सभी कारणोंपर सम्यक् रूपसे विचार करके कहा॥ २४॥ |
| गर्ग उवाच | गर्गाचार्यजी बोले— |
| मुने नैवापराधस्ते न मातुर्न कुलस्य च।<br>रेवत्यन्तं तु गण्डान्तं पुत्रदौःशील्यकारणम्॥ २५ | हे मुने! इसमें न तो आपका दोष है, न बालककी माताका दोष है और न तो कुलका दोष है। रेवती नक्षत्रका अन्तिम भाग—गण्डान्तयोग ही इस बालककी दुर्विनीतताका कारण है॥ २५॥ |
| दुष्टे काले यतो जन्म पुत्रस्य तव भो मुने।<br>तेनैव तव दुःखाय नान्यो हेतुर्मनागपि॥ २६ | हे मुने! अशुभ वेलामें आपके पुत्रका जन्म हुआ है, इसी कारण यह आपको दुःख दे रहा है; इसमें लेशमात्र भी अन्य कोई कारण नहीं है॥ २६॥ |
| तद्दुःखशान्तये ब्रह्मञ्जगतां मातरं शिवाम्।<br>समाराधय यत्नेन दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ २७ | अतः हे ब्रह्मन्! इस दुःखके शमनके लिये आप प्रयत्नपूर्वक समस्त दुर्गत्तियोंका विनाश करनेवाली कल्याणी जगदम्बा दुर्गाकी आराधना कीजिये॥ २७॥ |
| गर्गस्य वचनं श्रुत्वा ऋतवाक् क्रोधमूर्च्छितः।<br>रेवतीं तु शशापासौ व्योम्नः पततु रेवती॥ २८ | गर्गाचार्यजीका वचन सुनकर ऋतवाङ्मुनि क्रोधसे मूर्च्छित हो गये और उन्होंने रेवतीको शाप दे दिया कि वह आकाशसे नीचे गिर जाय॥ २८॥ |
| दत्ते शापे तु तेनाथ पूष्णो भञ्च पपात खात्।<br>कुमुदाद्रौ भासमानं सर्वलोकस्य पश्यतः॥ २९ | ऋतवाक्के शाप देते ही चमकता हुआ रेवती नक्षत्र सभी लोगोंके देखते-देखते आकाशसे कुमुदपर्वतपर जा गिरा॥ २९॥ |
| ख्यातो रैवतकश्चाभूत्तत्पातात् कुमुदाचलः।<br>अतीव रमणीयश्च ततः प्रभृति सोऽप्यभूत्॥ ३० | वह कुमुदपर्वत रेवतीके गिरनेके कारण रैवतक नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसी समयसे वह अत्यन्त रमणीक हो गया॥ ३०॥ |
| दत्त्वा शापं च रेवत्यै गर्गोक्तविधिना मुनिः।<br>समाराध्याम्बिकां देवीं सुखसौभाग्यभागभूत्॥ ३१ | रेवतीको शाप देकर मुनि ऋतवाक्ने महर्षि गर्गद्वारा बताये गये विधानके अनुसार देवी भगवतीकी सम्यक् आराधनाकर सुख और सौभाग्य प्राप्त किया॥ ३१॥ |
| स्कन्द उवाच | कार्तिकेयजी बोले— |
| रेवत्यृक्षस्य यत् तेजस्तस्माज्जाता तु कन्यका।<br>रूपेणाप्रतिमा लोके द्वितीया श्रीरिवाभवत्॥ ३२ | [हे अगस्त्यजी!] उस रेवती नक्षत्रके महान् तेजसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो अनुपम रूपवती होनेके कारण लोकमें दूसरी लक्ष्मीकी भाँति प्रतीत हो रही थी॥ ३२॥ |
| अथ तां प्रमुचः कन्यां रेवतीकान्तिसम्भवाम्।<br>दृष्ट्वा नाम चकारास्या रेवतीति मुदा मुनिः॥ ३३ | रेवती नक्षत्रकी कान्तिसे प्रादुर्भूत उस कन्याको देखकर मुनि प्रमुचने प्रसन्न होकर उसका ‘रेवती’—यह नाम रख दिया॥ ३३॥ |