देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 65, कुल 889 में से
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५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदादत्स्व मया दत्तामिमां कन्यां महीपते।<br>प्रियेत्यामन्त्रिता पूर्वं मा विचारं कुरुष्व भोः॥ ५७ | हे महीपते! अतः मेरे द्वारा प्रदत्त इस कन्याको आप स्वीकार कीजिये। आप इसे 'प्रिये' ऐसा सम्बोधित भी कर चुके हैं। अतएव अब शंकारहित होकर किसी अन्य विचारमें न पड़ें॥ ५७॥ |
| श्रुत्वैतत् सोऽभवत् तूष्णीं चिन्तयन् मुनिभाषितम्।<br>वैवाहिकं विधिं तस्य मुनिः कर्तुं समुद्यतः॥ ५८ | मुनिका यह वचन सुनकर राजा दुर्दम चिन्तन करते हुए चुप हो गये और मुनि उनके वैवाहिक अनुष्ठानकी तैयारीमें जुट गये॥ ५८॥ |
| अथोद्यतं विवाहाय दृष्ट्वा कन्याब्रवीन्मुनिम्।<br>रेवत्यृक्षे विवाहो मे तात कर्तुं त्वमर्हसि॥ ५९ | इसके बाद विवाह-कार्यके लिये मुनिको तत्पर देखकर रेवतीने कहा—हे तात! आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही सम्पन्न करायें॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>वत्से विवाहयोग्यानि सन्त्यन्यर्क्षाणि भूरिशः।<br>रेवत्यां कथमुद्वाहः पौष्णभं न दिवि स्थितम्॥ ६० | ऋषि बोले—वत्से! विवाहके योग्य अन्य बहुत-से नक्षत्र हैं। रेवती नक्षत्रमें विवाह कैसे होगा; क्योंकि रेवती तो आकाशमें स्थित है ही नहीं॥ ६०॥ |
| कन्योवाच<br>रेवत्यृक्षं विना कालो ममोद्वाहोचितो न हि।<br>अतः संप्रार्थयाम्येतद्विवाहं पौष्णभे कुरु॥ ६१ | कन्या बोली—रेवती नक्षत्रके अतिरिक्त अन्य कोई भी नक्षत्र मेरे विवाहके लिये उचित नहीं है। अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही करें॥ ६१॥ |
| ऋषिरुवाच<br>ऋतवाङ्मुनिना पूर्वं रेवतीभं निपातितम्।<br>भान्तरे चेन्न ते प्रीतिर्विवाहः स्यात् कथं तव॥ ६२ | ऋषि बोले—पूर्वकालमें मुनि ऋतवाक्ने रेवती नक्षत्रको पृथ्वीपर गिरा दिया था। इस प्रकार अन्य नक्षत्रमें यदि तुम्हारी श्रद्धा नहीं है, तब तुम्हारा विवाह कैसे होगा?॥ ६२॥ |
| कन्योवाच<br>तपः किं तप्तवानेक ऋतवागेव केवलम्।<br>भवता किं तपो नेदृक् तप्तं वाक्कायमानसैः॥ ६३ | कन्या बोली—तात! क्या केवल एक ऋतवाक्ने ही तपश्चर्या की है? क्या आपने मन-वचन-कर्मसे ऐसी तपःसाधना नहीं की है?॥ ६३॥ |
| जगत्स्रष्टुं समर्थस्त्वं वेद्यहं ते तपोबलम्।<br>रेवत्यृक्षं दिवि स्थाप्य ममोद्वाहं पितः कुरु॥ ६४ | हे पिताजी! मैं आपके तपोबलको जानती हूँ; आप जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। अतः आप अपने तपके प्रभावसे रेवतीको पुनः आकाशमें स्थापित करके उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह कीजिये॥ ६४॥ |
| ऋषिरुवाच<br>एवं भवतु भद्रं ते यथैव त्वं ब्रवीषि माम्।<br>त्वत्कृते सोममार्गेऽहं स्थापयिष्याद्य पौष्णभम्॥ ६५ | ऋषि बोले—तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा मुझसे कह रही हो, वैसा ही होगा, तुम्हारे हितार्थ मैं आज ही रेवती नक्षत्रको सोममार्ग (नक्षत्र-मण्डल)-में स्थापित करूँगा॥ ६५॥ |
| स्कन्द उवाच<br>एवमुक्त्वा मुनिस्तूर्णं पौष्णभं स्वतपोबलात्।<br>यथापूर्वं तथा चक्रे सोममार्गे घटोद्भव॥ ६६ | कार्तिकेयजी बोले—हे अगस्त्यजी! ऐसा कहकर मुनिने अपने तपोबलसे शीघ्र ही पूर्वकी भाँति रेवती नक्षत्रको फिरसे नक्षत्र-मण्डलमें स्थापित कर दिया॥ ६६॥ |