देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 655, कुल 889 में से
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| ६४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और उनका प्राकट्य
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| पराजिताः सुराः सर्वे राज्यं शुम्भः शशास ह।<br>एवं वर्षसहस्रं तु जगाम नृपसत्तम॥ १ | हे नृपश्रेष्ठ! सभी देवता पराजित हो गये। इसके बाद शुम्भ राज्यपर शासन करने लगा। इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये॥ १॥ |
| भ्रष्टराज्यास्ततो देवाश्चिन्तामापुः सुदुस्तराम्।<br>गुरुं दुःखातुरास्ते तु पप्रच्छुरिदमादृताः॥ २ | तत्पश्चात् राज्यच्युत होनेके कारण देवता महान् दुस्सह चिन्तामें पड़ गये। दुःखसे व्याकुल हुए वे देवता गुरु बृहस्पतिसे आदरपूर्वक यह पूछने लगे॥ २॥ |
| किं कर्तव्यं गुरो ब्रूहि सर्वज्ञस्त्वं महामुनिः।<br>उपायोऽस्ति महाभाग दुःखस्य विनिवृत्तये॥ ३<br><br>उपचारपरा नूनं वेदमन्त्राः सहस्रशः।<br>वाञ्छितार्थकरा नूनं सूत्रैः संलक्षिताः किल॥ ४<br><br>इष्टयो विविधाः प्रोक्ताः सर्वकामफलप्रदाः।<br>ताः कुरुष्व मुने नूनं त्वं जानासि च तत्क्रियाः॥ ५ | हे गुरो! अब हम क्या करें, आप हमें बतायें। आप सर्वज्ञ महामुनि हैं। हे महाभाग! दुःखकी निवृत्तिका उपाय भी तो होता है। हजारों ऐसे वैदिक मन्त्र हैं, जो उपचारोंसे परिपूर्ण हैं और सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं। सूत्रोंने उनका भलीभाँति निदर्शन भी किया है। सभी वांछित फल प्रदान करनेवाले अनेक प्रकारके यज्ञ भी बताये गये हैं। हे मुने! आप उनका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि आप उनकी क्रिया-विधिको भलीभाँति जानते हैं॥ ३—५॥ |
| विधिः शत्रुविनाशाय यथोद्दिष्टः सदागमे।<br>तं कुरुष्वाद्य विधिवद्यथा नो दुःखसंक्षयः॥ ६<br><br>भवेदांगिरसाद्यैव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>दानवानां विनाशाय अभिचारं यथामति॥ ७ | शत्रुओंके विनाशके लिये वेदमें जैसा उपाय बताया गया है, अब आप विधिपूर्वक उसका अनुष्ठान कीजिये, जिससे हमारे दुःखका पूर्णरूपसे नाश हो जाय। हे आंगिरस! दानवोंके विनाशके लिये आप अपनी बुद्धिके अनुसार आज ही अभिचारकर्म आरम्भ करनेकी कृपा कीजिये॥ ६-७॥ |
बृहस्पतिरुवाच | बृहस्पति बोले—
</div>| बृहस्पतिरुवाच | बृहस्पति बोले— |
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| सर्वे मन्त्राश्च वेदोक्ता दैवाधीनफलाश्र्च ते।<br>न स्वतन्त्राः सुराधीश तथैकान्तफलप्रदाः॥ ८ | हे देवराज! वेदोंमें बताये गये सभी मन्त्र प्रारब्धके अनुसार ही फल प्रदान करनेवाले हैं। वे स्वतन्त्र नहीं हैं और नियमके अनुसार ही फल प्रदान करते हैं॥ ८॥ |
| मन्त्राणां देवता यूयं ते तु दुःखैकभाजनम्।<br>जाताः स्म कालयोगेन किं करोमि प्रसाधनम्॥ ९ | उन मन्त्रोंके देवता तो आप ही लोग हैं। जब आपलोग स्वयं समयके फेरसे कष्टमें पड़े हुए हैं तो मैं कौन-सा उपाय करूँ?॥ ९॥ |
| इन्द्राग्निवरुणादीनां यजनं यज्ञकर्मसु।<br>ते यूयं विपदं प्राप्ताः करिष्यन्ति किमिष्टयः॥ १० | यज्ञ-कर्मोंमें इन्द्र, अग्नि, वरुण आदिकी पूजा की जाती है और वे आप सब देवता ही स्वयं विपत्ति भोग रहे हैं, तब यज्ञ क्या कर सकेंगे?॥ १०॥ |
| अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो न विद्यते।<br>उपायस्त्वथ कर्तव्य इति शिष्टानुशासनम्॥ ११ | अवश्यम्भावी घटनाओंका कोई प्रतीकार नहीं है; फिर भी [संकटसे बचनेके लिये] उपाय तो करना ही चाहिये, यह शिष्ट पुरुषोंका उपदेश है॥ ११॥ |