भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 889 में से

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पृष्ठ 660
अ० २२ ]पञ्चम स्कन्ध६५१

| व्यास उवाच <br> तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या मोहिता रूपसम्पदा। <br> प्रेमपूर्वं हृदुत्साहास्तामूचुः सुरसत्तमाः॥ ४९ | **व्यासजी बोले—**भगवतीका यह वचन सुनकर उनके रूप-वैभवसे मोहित श्रेष्ठ देवताओंका हृदय उत्साहसे परिपूर्ण हो गया, जिससे वे प्रेमपूर्वक उनसे कहने लगे॥ ४९॥ | | देवा ऊचुः <br> देवि स्तुमस्त्वां विश्वेशि प्रणताः स्म कृपार्णवे। <br> पाहि नः सर्वदुःखेभ्यः संविग्नान्दैत्यतापितान्॥ ५० | **देवता बोले—**जगत्‌को नियन्त्रणमें रखनेवाली हे देवि! हम आपकी स्तुति कर रहे हैं, हम आपके शरणागत हैं। हे कृपासिन्धो! दैत्योंसे सताये गये हम देवताओंकी सम्पूर्ण दुःखोंसे रक्षा कीजिये॥ ५०॥ | | पुरा त्वया महादेवि निहत्यासुरकण्टकम्। <br> महिषं नो वरो दत्तः स्मर्तव्याहं सदापदि॥ ५१ <br><br> स्मरणाद्दैत्यजां पीडां नाशयिष्याम्यसंशयम्। <br> तेन त्वं संस्मृता देवि नूनमस्माभिरित्यपि॥ ५२ | हे महादेवि! पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटक बने महिषासुरका वध करके आपने हमें वर प्रदान किया था—‘आपलोग संकटमें मुझे सदा याद कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं दैत्योंके द्वारा आपलोगोंको पहुँचायी गयी पीड़ाका निःसन्देह नाश कर दूँगी।’ हे देवि! इसीलिये हमलोगोंने आपका स्मरण किया है॥ ५१-५२॥ | | अद्य शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ घोरदर्शनौ। <br> उत्पन्नौ विघ्नकर्तारावहन्त्यौ पुरुषैः किल॥ ५३ <br><br> रक्तबीजश्च बलवांश्चण्डमुण्डौ तथासुरौ। <br> एतैरन्यैश्च देवानां हृतं राज्यं महाबलैः॥ ५४ <br><br> गतिरन्या न चास्माकं त्वमेवासि महाबले। <br> कुरु कार्यं सुराणां वै दुःखितानां सुमध्यमे॥ ५५ | इस समय शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव उत्पन्न हुए हैं, जो देखनेमें महाभयंकर हैं। वे [हमारे कार्योंमें] विघ्न डाला करते हैं। वे पुरुषोंसे सर्वथा अवध्य हैं। ऐसे ही बलशाली दानव रक्तबीज तथा चण्ड और मुण्ड भी हैं। इन सभी तथा अन्य महाबली दानवोंने हम देवताओंका राज्य छीन लिया है। हे महाबले! हमलोगोंका दूसरा कोई अवलम्ब नहीं, एकमात्र आप ही हमारी शरण हैं। हे सुमध्यमे! आप दुःखित देवताओंका कार्य सिद्ध करें॥ ५३—५५॥ | | देवास्त्वदङ्घ्रिभजने निरताः सदैव <br> ते दानवैरतिबलैर्विपदं सुनीताः। <br> तान्देवि दुःखरहितान्कुरु भक्तियुक्ता- <br> न्मातस्त्वमेव शरणं भव दुःखितानाम्॥ ५६ | देवता आपके चरणोंकी उपासनामें सदैव संलग्न रहते हैं। [इस समय] वे सब महान् बलशाली दैत्योंके द्वारा विपत्तिमें डाल दिये गये हैं। अतः हे देवि! आप उन भक्तिपरायण देवताओंको दुःखरहित कर दीजिये। हे माता! आप दुःखित देवताओंका आश्रय बन जाइये॥ ५६॥ | | सकलभुवनरक्षा देवि कार्या त्वयाद्य <br> स्वकृतमिति विदित्वा विश्वमेतद् युगादौ। <br> जननि जगति पीडां दानवा दर्पयुक्ताः <br> स्वबलमदसमेतास्ते प्रकुर्वन्ति मातः॥ ५७ | हे देवि! युगके आरम्भमें इस विश्वकी रचना आप भगवतीने स्वयं की थी—यह जानकर आप इस समय सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा करें। हे जननि! हे माता! अपने बलसे मदान्वित तथा अभिमानमें चूर दानव जगत्में लोगोंको पीड़ित कर रहे हैं॥ ५७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देवकृतदेव्याराधनवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥


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