देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 664, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 664
अ० २३] पञ्चम स्कन्ध ६५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भेदे प्रयुज्यमानेऽपि रसाभासस्तु जायते।<br>निग्रहे रसभङ्गः स्यात्तस्मात्तौ दूषितौ बुधैः ॥ ३४ | भेदनीतिका प्रयोग करनेपर रसका आभासमात्र हो पाता है और दण्डनीतिका प्रयोग करनेपर रसभंग ही हो जाता है, अतः विद्वान् पुरुषोंने इन दोनोंको दोषपूर्ण बताया है॥ ३४॥ |
| सामदानमुखैर्वाक्यैः श्लक्ष्णैर्नर्मयुतैस्तथा।<br>का न याति वशे दूत कामिनी कामपीडिता ॥ ३५ | हे दूत! ऐसी कौन स्त्री होगी; जो साम, दान—इन मुख्य नीतियोंसे सम्पन्न, मधुर तथा हास-परिहाससे परिपूर्ण वाक्योंके द्वारा कामपीड़ित होकर वशमें न हो जाय॥ ३५॥ |
| व्यास उवाच | |
| सुग्रीवस्तु वचः श्रुत्वा शुम्भोक्तं सुप्रियं पटु।<br>जगाम तरसा तत्र यत्रास्ते जगदम्बिका ॥ ३६ | **व्यासजी बोले—**शुम्भके द्वारा कही गयी अत्यन्त प्रिय तथा चातुर्यपूर्ण बात सुनकर सुग्रीव बड़े वेगसे उधर चल पड़ा, जहाँ जगदम्बिका विराजमान थीं॥ ३६॥ |
| सोऽपश्यत्सुमुखीं कान्तां सिंहस्योपरि संस्थिताम्।<br>प्रणम्य मधुरं वाक्यमुवाच जगदम्बिकाम् ॥ ३७ | वहाँपर उसने देखा कि एक सुन्दर मुखवाली युवती सिंहपर सवार है। तब जगदम्बिकाको प्रणाम करके वह मधुर वाणीमें कहने लगा—॥ ३७॥ |
| दूत उवाच | |
| वरोरु त्रिदशारातिः शुम्भः सर्वाङ्गसुन्दरः।<br>त्रैलोक्याधिपतिः शूरः सर्वजिद्राजते नृपः ॥ ३८ | **दूत बोला—**हे सुजघने! देवताओंके शत्रु राजा शुम्भ सर्वांगसुन्दर और पराक्रमी हैं। सबको जीतकर वे तीनों लोकोंके अधिपति हो गये हैं॥ ३८॥ |
| तेनाहं प्रेषितः कामं त्वत्सकाशं महात्मना।<br>त्वद्रूपश्रवणासक्तचित्तेनातिविदूयता ॥ ३९ | आपके सौन्दर्यके विषयमें सुनकर आपपर आसक्त मनवाले उन्हीं महाराज शुम्भने व्याकुल होकर मुझे आपके पास भेजा है॥ ३९॥ |
| वचनं तस्य तन्वङ्गि शृणु प्रेमपुरःसरम्।<br>प्रणिपत्य यथा प्राह दैत्यानामधिपस्त्वयि ॥ ४० | हे तन्वंगि! दैत्यपति शुम्भने आपको प्रणाम करके जो प्रेमपूर्ण वचन कहा है, उनके उस वचनको आप सुनें—॥ ४०॥ |
| देवा मया जिताः सर्वे त्रैलोक्याधिपतिस्त्वहम्।<br>यज्ञभागानहं कान्ते गृह्णामीह स्थितः सदा ॥ ४१ | हे कान्ते! मैंने सभी देवताओंको जीत लिया है, इस समय मैं तीनों लोकोंका स्वामी हूँ। मैं यहाँ रहते हुए सदा यज्ञभाग प्राप्त करता हूँ॥ ४१॥ |
| हृतसारा कृता नूनं द्यौर्मया रत्नवर्जिता।<br>यानि रत्नानि देवानां तानि चाहृतवानहम् ॥ ४२ | मैंने स्वर्गलोककी सभी सार वस्तुएँ छीन ली हैं और उसे रत्नविहीन कर दिया है। देवताओंके पास जो भी रत्न थे, उन सबको मैंने हर लिया है॥ ४२॥ |
| भोक्ताहं सर्वरत्नानां त्रिषु लोकेषु भामिनि।<br>वशानुगाः सुराः सर्वे मम दैत्याश्च मानवाः ॥ ४३ | हे भामिनि! तीनों लोकोंमें सभी रत्नोंका भोग करनेवाला एकमात्र मैं ही हूँ। देवता, दैत्य और मनुष्य—ये सब मेरे अधीन रहते हैं॥ ४३॥ |
| त्वद्गुणैः कर्णमागत्य प्रविश्य हृदयान्तरम्।<br>त्वदधीनः कृतः कामं किङ्करोऽस्मि करोमि किम् ॥ ४४ | तुम्हारे गुणोंने कानोंके मार्गसे मेरे हृदयमें प्रवेश करके मुझे पूर्णरूपसे तुम्हारे वशमें कर दिया है। अब मैं क्या करूँ? मैं तो तुम्हारा दास बन गया हूँ॥ ४४॥ |