भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 674

| अ० २५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६६५ | | :--- | :--- | | विरथः परिघं गृह्य सर्वलोहमयं दृढम्।<br>आजगाम रथोपस्थं कुपितो धूम्रलोचनः॥ २० | अब रथसे विहीन वह धूम्रलोचन कुपित होकर एक लोहमय मजबूत परिघ लेकर देवीके रथके सन्निकट आ गया॥ २०॥ | | वाचा निर्भर्त्सयन्कालीं करालः कालसन्निभः।<br>अद्यैव त्वां हनिष्यामि कुरूपे पिङ्गलोचने॥ २१<br><br>इत्युक्त्वा सहसागत्य परिघं क्षिपते यदा।<br>हुङ्कारेणैव तं भस्म चकार तरसाम्बिका॥ २२ | कालसदृश भयंकर वह धूम्रलोचन वाणीसे भगवती कालीको फटकारते हुए कहने लगा—‘कुरूपा तथा पिंगलनेत्रोंवाली! मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा’ ऐसा कहकर वह ज्यों ही कालिकापर परिघ चलानेको उद्यत हुआ, देवीने अपने हुंकारमात्रसे उसे तुरंत भस्म कर दिया॥ २१-२२॥ | | दृष्ट्वा भस्मीकृतं दैत्यं सैनिका भयविह्वलाः।<br>चक्रुः पलायनं सद्यो हा तातेत्यब्रुवन्पथि॥ २३ | तब दैत्य धूम्रलोचनको भस्म हुआ देखकर सभी सैनिक भयाक्रान्त होकर ‘हा तात’—ऐसा कहते हुए तुरंत मार्ग पकड़कर भाग चले॥ २३॥ | | देवास्तं निहतं दृष्ट्वा दानवं धूम्रलोचनम्।<br>मुमुचुः पुष्पवृष्टिं ते मुदिता गगने स्थिताः॥ २४ | उस धूम्रलोचनको मारा गया देखकर आकाशमें विद्यमान देवगण प्रसन्न होकर भगवतीपर पुष्प बरसाने लगे॥ २४॥ | | रणभूमिस्तदा राजन् दारुणा समपद्यत।<br>निहतैर्दानवैरश्वैः खरैश्च वारणैस्तथा॥ २५<br><br>गृध्राः काका वटाः श्येना वरफा जम्बुकास्तथा।<br>ननृतुश्चक्रुशुः प्रेतान्पतितान् रणभूमिषु॥ २६ | हे राजन्! मरे हुए दानवों, घोड़ों, खच्चरों और हाथियोंसे [पट जानेके कारण] वह रणभूमि उस समय बड़ी भयानक लग रही थी। युद्धभूमिमें पड़े हुए मृत दानवोंको देखकर गीध, कौए, बाज, सियार और पिशाच नाचने तथा कोलाहल करने लगे॥ २५-२६॥ | | अम्बिका तद्रणस्थानं त्यक्त्वा दूरं स्थलान्तरे।<br>गत्वा चकार चाप्युग्रं शङ्खनादं भयप्रदम्॥ २७ | अब भगवती अम्बिकाने उस रणभूमिको छोड़कर वहाँसे कुछ दूरीपर जाकर अत्यन्त तीव्र तथा भयदायक शंखनाद किया॥ २७॥ | | तं श्रुत्वा दरशब्दं तु शुम्भः सद्मनि संस्थितः।<br>दृष्ट्वाथ दानवाम्भग्नानागतान् रुधिरोक्षितान्॥ २८<br><br>छिन्नपादकराक्षांश्च मञ्चकारोपितानपि।<br>भग्नपृष्ठकटिग्रीवान्क्रन्दमानाननेकंशः ॥ २९<br><br>वीक्ष्य शुम्भो निशुम्भश्च क्व गतो धूम्रलोचनः।<br>कथं भग्नाः समायाता नानीता किं वरानना॥ ३०<br><br>सैन्यं कुत्र गतं मन्दाः कथयन्तु यथोचितम्।<br>कस्यायं शङ्खनादोऽद्य श्रूयते भयवर्धनः॥ ३१ | अपने महलमें स्थित शुम्भको भी वह भयानक शंख-ध्वनि सुनायी पड़ी। उसी समय उसने भागकर आये हुए बहुत-से दैत्योंको देखा। उनमेंसे बहुतोंके अंग भंग हो गये थे और वे रक्तसे लथपथ थे। अनेक दैत्योंके हाथ-पैर कट गये थे और नेत्र भग्न हो गये थे। कुछ दैत्य तो शय्या आदिपर लादकर लाये जा रहे थे; बहुतोंकी पीठ, कमर और गर्दन टूट गयी थी। सब-के-सब जोर-जोरसे चीख रहे थे। उन्हें देखकर शुम्भ-निशुम्भने सैनिकोंसे पूछा—‘धूम्रलोचन कहाँ गया? तुमलोग इस तरह अंग-भंग होकर क्यों आये हो और उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको क्यों नहीं ले आये? हे मूर्खो! सही-सही बताओ कि मेरी सेना कहाँ गयी और भयको बढ़ानेवाला यह किसका शंखनाद इस समय सुनायी पड़ रहा है?’॥ २८—३१॥ |