देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 679, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 679
| ६७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ | | :--- | :--- |
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कार्यमित्रं परिक्षिप्य धर्ममित्रं समाश्रयेत्।<br>देवाः स्वार्थपराः कामं त्वामहं सत्यमब्रवम्॥ १५<br><br>भज शुम्भं सुरेशानं जेतारं भुवनेश्वरम्।<br>चतुरं सुन्दरं शूरं कामशास्त्रविशारदम्॥ १६<br><br>ऐश्वर्यं सर्वलोकानां प्राप्स्यसे शुम्भशासनात्।<br>निश्चयं परमं कृत्वा भर्तारं भज शोभनम्॥ १७ | अपना ही कार्य साधनेमें तत्पर रहनेवाले मित्रका त्यागकर धर्ममार्गपर चलनेवाले मित्रका ही अवलम्बन करना चाहिये। देवता बड़े ही स्वार्थी हैं, मैंने तुमसे यह सत्य कहा है, अतः तुम देवताओंके शासक, विजेता, तीनों लोकोंके स्वामी, चतुर, सुन्दर, वीर और कामशास्त्रमें प्रवीण शुम्भको स्वीकार कर लो। शुम्भके अधीन रहनेसे तुम समस्त लोकोंका वैभव प्राप्त करोगी। अतएव दृढ़ निश्चय करके तुम सौन्दर्यसम्पन्न शुम्भको अपना पति बना लो॥ १५-१७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा चण्डस्य जगदम्बिका।<br>मेघगम्भीरनिनदं जगर्ज पुनरब्रवीत्॥ १८<br><br>गच्छ जाल्म मृषा किं त्वं भाषसे वञ्चकं वचः।<br>त्यक्त्वा हरिहरादींश्च शुम्भं कस्माद्भजे पतिम्॥ १९ | व्यासजी बोले— चण्डकी यह बात सुनकर जगदम्बाने मेघके समान गम्भीर ध्वनिमें गर्जना की और वे बोलीं— धूर्त! भाग जाओ; तुम यह छलयुक्त बात व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? विष्णु, शिव आदिको छोड़कर मैं शुम्भको अपना पति किसलिये बनाऊँ?॥ १८-१९॥ |
| न मे कश्चित्पतिः कार्यों न कार्यं पतिना सह।<br>स्वामिनी सर्वभूतानामहमेव निशामय॥ २० | न तो मुझे किसीको पति बनाना है और न तो पतिसे मेरा कोई काम ही है; क्योंकि जगत्के सभी प्राणियोंकी स्वामिनी मैं ही हूँ; इसे तुम सुन लो॥ २०॥ |
| शुम्भा मे बहवो दृष्टा निशुम्भाश्च सहस्रशः।<br>घातिताश्च मया पूर्वं शतशो दैत्यदानवाः॥ २१ | मैंने हजारों-हजार शुम्भ तथा निशुम्भ देखे हैं और पूर्वकालमें मैंने सैकड़ों दैत्यों तथा दानवोंका वध किया है॥ २१॥ |
| ममाग्रे देववृन्दानि विनष्टानि युगे युगे।<br>नाशं यास्यन्ति दैत्यानां यूथानि पुनरद्य वै॥ २२<br><br>काल एवागतोऽस्त्यत्र दैत्यसंहारकारकः।<br>वृथा त्वं कुरुषे यत्नं रक्षणायात्मसन्ततेः॥ २३ | प्रत्येक युगमें अनेक देवसमुदाय मेरे सामने ही नष्ट हो चुके हैं। दैत्योंके समूह अब फिर विनाशको प्राप्त होंगे। दैत्योंका विनाशकारी समय अब आ ही गया है। अतएव तुम अपनी सन्ततिकी रक्षाके लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हो॥ २२-२३॥ |
| कुरु युद्धं वीरधर्मरक्षायै त्वं महामते।<br>मरणं भावि दुस्त्याज्यं यशो रक्ष्यं महात्मभिः॥ २४ | हे महामते! तुम वीरधर्मकी रक्षाके लिये मेरे साथ युद्ध करो। मृत्यु तो अवश्यम्भावी है, इसे टाला नहीं जा सकता। अतः महात्मा लोगोंको यशकी रक्षा करनी चाहिये॥ २४॥ |
| किं ते कार्यं निशुम्भेन शुम्भेन च दुरात्मना।<br>वीरधर्मं परं प्राप्य गच्छ स्वर्गं सुरालयम्॥ २५ | दुराचारी शुम्भ तथा निशुम्भसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? अतः अब तुम श्रेष्ठ वीरधर्मका आश्रय लेकर देवलोक स्वर्ग चले जाओ॥ २५॥ |
| शुम्भो निशुम्भश्चैवान्ये ये चात्र तव बान्धवाः।<br>सर्वे तवानुगाः पश्चादागमिष्यन्ति साम्प्रतम्॥ २६ | अब शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे जो अन्य बन्धु-बान्धव हैं, वे सब भी बादमें तुम्हारा अनुसरण करते हुए वहाँ पहुँचेंगे॥ २६॥ |